रविवार, 27 अगस्त 2017

अभिप्रेरणा

आखिर कोई व्यक्ति यह सब क्यों करता है?
मनुष्यों के क्रियाकलापों का कारण क्या है?
वे कौनसी प्रेरणाएं हैं जो मानव को विभिन्न व्यवहार करते हुए सक्रिय रहने को मजबूर करती है?
भूख, प्यास और पेट भरने से इतर भी, मानव के ऐसे अनेक व्यवहार हैं जिनकी प्रेरणाएं समझ से परे हैं।
जैसे किसी गरीब की सहायता,,,,
या नवरात्रि में व्रत रखकर भूखा रहना,,,,,
अथवा कोई  किसी राह चलते को मार देता है,,,?

पश्चिम के एक दार्शनिक हुए,,,,  #कार्ल_मार्क्स।
मार्क्स के अनुसार सभी व्यवहार धन केंद्रित ही हैं। धन को केंद्र में रखकर प्रत्येक घटना की व्याख्या सम्भव है।
वे मानव व्यवहार की समस्त अभिप्रेरणाओं के मूल में अर्थ को ही देखते हैं। उनका चिंतन मार्क्सवाद कहलाया।
उनके अनुसार बिना अर्थ प्रयोजन के कोई मानव कुछ भी नहीं कर सकता। वास्तव में धर्म कर्म वगैरह कुछ नहीं है, पुरोहितों के धन कमाने के टोटके भर हैं। दुनिया में सारे रिश्ते, नाते, व्यवहार, खुले में या परोक्ष रूप में, धन केंद्रित ही है।

एक दूसरे दार्शनिक हुए,,,, फ्रायड। ये मनोवैज्ञानिक थे। इन्होंने #काम की व्याख्या की। इनके अनुसार समस्त व्यवहार का आधार सेक्स है। बिना कामवासना के व्यवहार की व्याख्या सम्भव ही नहीं। उनके अनुसार संसार की सभी प्रेरणाओं के मूल में काम ही है।
हर घटना को सैक्स केंद्रित चिंतन से समझा जा सकता है।

एक तीसरे हुए, युंग। ये भी जर्मन थे। इनका दर्शन फ्रायड का प्रतिक्रिया में था, उनके अनुसार व्यक्ति अपनी सामाजिक स्वीकृति चाहता है। वह क्रमशः अपनी पहचान बनाना चाहता है। उसे अपनी उपस्थिति जतानी होती है। मानव व्यवहार की विभिन्न प्रेरणाओं की व्यख्या का आधार आत्म स्वीकृति है, या इसे यूँ कहें कि वह समाज मे अपनी पहचान बनाना चाहता है।

इस प्रकार अभिप्रेरणाओं के तीन पश्चिमी सिद्धांत हैं जो अलग अलग लोगों ने अलग अलग समय पर  प्रचलित हुए।
1, मार्क्स का अर्थवाद
2,फ्रायड का कामवासना वाद,
3, युंग का यशप्राप्ति की इच्छा वाद।

और आपको आश्चर्य होगा कि ये तीनों सिद्धांत भारतीय दर्शनों में उससे सैकड़ों वर्ष् पूर्व कहे जा चुके हैं।
वेदांत दर्शन में मानव व्यवहार की प्रेरणाओं को इस प्रकार से बताया गया है।
1,वित्तैषणा
2,पुत्रैषणा
3,लोकेषणा
क्रमशः,,,, धन, सेक्स और यश से सम्बद्ध ही हैं।
और यह सिद्धांत पूर्ण
भी लगता है।
इतना ही नहीं, भारतीय दर्शन में इन तीनों से ही ऊपर उठकर, इससे भी आगे जाने की बात कही है।
वास्तव में, योग, संन्यास, वैराग्य, मुमुक्षुत्व, इन सबकी अवस्थिति इन तीन एषणाओं से बहुत आगे की यात्रा का वृतांत है।
आप ही तय कीजिए कि परिपूर्णता कहाँ है???
#kss

सोमवार, 14 अगस्त 2017

भाषण ऐसे दें

भाषण देने के इच्छुक लोगों को कुछ टिप्स बता रहा हूँ।
वैसे तो यह अभ्यास और मौलिकता की बात है।
जहाँ तक हो सके शाब्दिक आडम्बर से बचा जाना चाहिए।
जब भी कोई उर्दू की डायलॉगबाजी करता है या इंग्लिश  छांटता है, मैं समझ जाता हूँ यह कोई खास बात नहीं कह पाएगा।
रटी रटाई शायरी, कुछ प्रसिद्ध धारणाओं या सूक्तियों के सहारे गोल गोल घूमना भाषण बिल्कुल नहीं है!!
अपने समझे हुए मूल विचारों को सरल, स्पष्ट और दृढ़ता से कहना चाहिए और जब लगे कि बात पूरी हो गई तो अनावश्यक लम्बा नहीं खींचना चाहिए।

सुनी सुनाई या रटी रटाई बातों से सदैव परहेज रखें। प्रसंग और तर्क का हमेशा ध्यान रखें, भ्रामक तथ्यों से बचें और अपनी राय को अंतिम सिद्ध करने की कोशिश न करें।
अपने भाषण का मूल्यांकन श्रोताओं को करने दें। उनके #आउटपुट का निरीक्षण करते रहें। पिष्टपेषण से बचें और यथासंभव पुनरुक्त कथन न करें।

आजकल कुछ मोटिवेटर घूमते हुए बोलते हैं, चिल्लाते हैं और मंच पर घूमते किसी ईसाई प्रचारक की तरह आंखें बंद कर मुँह से थूक उछालते हैं, ऐसे #टोटकों से बचना चाहिए।

कुछ प्रसिद्ध भाषणों की वीडियो ऑडियो सुनें। आंचलिक भाषी श्रेष्ठ वक्ताओं को सुनें, और भाषा पर अपनी अच्छी पकड़ बनाएं।
व्याकरण ज्ञान रखे। लघु सूत्र याद करें और बिंदुओं को नोट कर रखें।

यदि आप भारत, भारतीय, राष्ट्र, हिंदुत्व इत्यादि विषय पर बोलना चाहते हैं तो #सत्यार्थ प्रकाश, स्वामी विवेकानंद, पूजनीय गुरुजी आदि के साहित्य को अवश्य पढ़ें। सब पढ़कर फिर अपनी बुद्धि से सोचें।
प्रतिपक्षियों के वैचारिक दर्शन को भी जानें।
थोड़ा सामान्य ज्ञान, थोड़ा विज्ञान, थोड़ा इतिहास, थोड़ा थोड़ा विदेशी प्रसिद्ध दर्शनों का भी अध्ययन करें।

हर मामले में अपनी टांग अड़ाने से बचें और,,,, किसी निश्चित विषय के विशेषज्ञ बनने की दिशा में #प्रवृत्त हों।
इति शुभम।।
#kss

रविवार, 30 जुलाई 2017

प्रश्न पत्र

एक बडी परीक्षा का प्रश्नपत्र बनाने की कार्यशाला थी।
मैं भी गया था।
हालांकि यह काफी गोपनीय और जिम्मेदारी का कार्य है और उसे सार्वजनिक नहीँ किया जा सकता।
कार्यशाला के संयोजक की बहुत सारी विशेषताएं थीं।
वे मंत्रीजी के खास थे। एक बड़े नेता के कुटुंब से भी थे। स्थापित बुद्धिजीवी, लेखक प्रोफेसर, शिक्षाविद वगैर वगैर तो थे ही,,,, कठोर अनुशासन के लिए भी प्रसिद्ध थे, सत्तापक्ष के चहेते भी थे!!
ज्यादातर सम्भागी भी नये थे। नई सत्ता के अनुरूप "कुछ कर गुजरने"की उमंग और आशा से भरे हुए।

"उन्होंने जैसी मनमानी की वैसी तो नहीं करेंगे पर जो #कानूनन सही है और सत्य है वह तो कर ही सकते हैं।"   इस आशय की बातचीत हो रही थी।

कुछ प्रोफेशनल और #अनुभवी बुजुर्गों के चेहरे बता रहे थे कि वे रीत का रायता निपटाने आए हैं और जरूरत पड़ी तो विरोध भी करेंगे!!

एक प्रभाग का प्रभारी मुझे बनाया गया। दिन भर अपनी कमेटी के मेम्बर्स को समझने और समझाने में बीता!!

सभी जन इस बात पर सहमत थे कि हम ऐसा कुछ करें कि काम की प्रशंसा भी हो और हमें इस तरह बार बार बुलाया भी जाता रहे!!

मैंने उनकी समीक्षा बुद्धि की टोह ली। कुछ ट्रिक समझाए कि एक ही टॉपिक पर वामपंथियों और हमारे द्वारा बनाए प्रश्नों में किस प्रकार की भिन्नता होगी।

हमें उद्देश्यों की पूर्ति करने के साथ साथ यह भी ध्यान रखना है कि हम ऐसा पेपर सेट करें कि कम्पीटिशन में वामपंथी साहित्य को छात्र कम से कम पढें।

हमारे प्रश्नों की धार ऐसी हो कि विवश होकर प्रतियोगी वही पढें जो हम पढ़ाना चाहते हैं,,,, बिलकुल वास्तविक और भारतीयता के अनुकूल।

हमारे पेपर बनाने भर की देर है। बाद में प्रश्नों का #जायका समझकर ही सारे कोचिंग संस्थान, क्रोनोलॉजी, कम्पीटिशन साहित्य आदि अपनी दिशा बदल देंगे।

हमें अपनी तरफ से नया कुछ भी नहीं थोपना है, मौजूदा सिलेबस में ही वे सारे तत्व, तथ्य और परिभाषाएं विद्यमान है जिन्हें हम उभारना चाहते हैं। अभी इतना जिंदा तो है ही भारत!!

बस जरूरत है हमारे दृष्टिकोण की,,,, और #उनके छल,छद्म, टोटकों के पहचान की!!
इसके लिए हमें कॉपी पेस्ट से बचना होगा, परिश्रम करना होगा। अपने #ट्रिक्स एक दूसरे से साझा करने होंगे और तथ्यों को गहराई से समझने की दिशा में और आगे बढ़ना होगा।

ऐसा करके हम न केवल भारतीय मेधा का रुख मोड़ सकते हैं, बल्कि उन सभी देशद्रोही, jnu छाप लाल लँगूरों के मुँह पर तमाचा मार सकते हैं जो अपनी विकृत मानसिकता को देश की नौकरशाही में रोप कर खूब बड़ी गिरोहबंदी में लीन हैं।

पर सावधान,,,,, बहुत सूक्ष्मता से,,, बहुत ही महीन कारीगरी से,,,,, एक एक बात सोच समझकर,,,,, उनसे भी बड़ी समझ और रणनीति से हमें यह सब करना है, जिससे कल को कोई कोर्ट कचहरी या मिडियाबाजी का #झंझट नहीं रहे!!

हमारी योजना इतनी ठोस और निरापद थी कि इस कल्पना से ही हम रोमांचित हो गये।

हममें सपने सच करने की उमंग और उत्साह ऐसा था कि हमने आस पास वाले दूसरे ग्रुप्स में भी यह चर्चा चलाई। जिस जिस को यह समझ आया वह पूर्णतः हमसे सहमत था।
दो दिन इसमें बीत गए, तीसरे दिन कार्य आरम्भ करना था। इन दो दिन-रात्रियों में हमने पूरी लायब्रेरी छान डाली। नोट्स और सन्दर्भ से डायरियां भर गईं। पन्ने पर पन्ने लिखे जाने लगे। परस्पर सलाह कर प्रश्न की धार की तीक्ष्णता और दिशा के सारे जोड़ घटा माप लिए।
हर वह प्रश्न जो वामपंथी-विकृत सोच के निहित स्वार्थों का पोषक था, हमने चीर फाड़ कर उसकी चिन्दी चिन्दी की और उसी सामग्री से एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया।
जैसे,,,,
प्रश्न यदि वनवासियों के असंतोष का था तो हमने उसे उनकी प्रकृति पूजा की परम्परा में बदल दिया।
प्रश्न यदि हिंदी गद्य में उर्दू के योगदान का था तो हमने अदालती शब्दों में उर्दू के दुराग्रह के आंदोलन की बात छेड़ी।
प्रश्न यदि पंचशील के सिद्धांत का था तो हमने वहाँ चीन के विस्तारवाद को पूछा।
हम अब सिद्धहस्त हो चुके थे।
वामपंथ का एक किला जड़ से ढहने वाला था।
हमने अपनी कार्ययोजना और रूपरेखा "संयोजकमहोदय" को समझाई और उनसे हरी झंडी चाही।

प्रश्न पढ़ते ही वे #फक्क से अरुचि से भर उठे।
"इतनी जल्दी नहीं,,,,!" वे असहाय से घबराने लगे।
मैं उन्हें समझाने लगा कि "सर कुछ नहीं होगा,,,,!"
पर वे अत्यंत आतंकित दिखने लगे।
हवा का रुख देख कुछ बुजुर्ग भी आगे आये। वे आश्वस्त करने लगे कि बहुत पक्का काम हुआ है। जो वास्तविकता है, वैसा हुआ है और नये सदस्यों ने बहुत परिश्रम करके असत के विरुद्ध पहली बार कोई स्थाई कार्य किया है। कोर्ट इत्यादि के झंझट का सवाल ही नहीं!!
पर वे क्रमशः कठोर होते गए। रिस्क शब्द उनकी डिक्शनरी में ही नहीं था।
जो चल रहा है, चलने दो!!
मैं,,,,, जो अब तक उन्हें बहुत जिम्मेदार, ज्ञानी, कूटनीतिज्ञ और न जाने क्या क्या समझ रहा था,,,, कुछ क्षण के लिए सदमे में आ गया।
समझ गया कि यह लड़ाई इतनी #सरल नहीँ!!
फिर से कुंआ खोदूँगा।
ताजा पानी पीऊंगा।।
#kss

बुधवार, 19 जुलाई 2017

वर्जित विषय, पर जरूरी

सर मोटो सपूत, काया मोटी कपूत।
कृपया महिलाएं और बच्चे पोस्ट से दूर रहें।
ऐसा है कि एक शास्त्र है #सामुद्रिक शास्त्र।
इसका समुद्र से कोई लेना देना नहीँ है।
स + मुद्रा, अर्थात शारीरिक अंगों के लक्षणों का वर्णन है। जिसे पर्सनल्टी का फर्स्ट इम्प्रेशन कहते हैं न, कुछ कुछ वैसा।
इस शास्त्र को पढ़कर ही कवियों ने नख शिख वर्णन करने सीखे और इसी आधार पर ज्योतिषियों ने हस्तरेखा आदि के लिए कुछ घोषणाएं कीं।
नाक, कान, बाहु, जंघाएँ, पेट, गर्दन आदि की आनुपातिक संरचना के आधार पर यह निर्णय लिए गये कि क्या सुंदर और क्या कुरूप होता है।
ज्ञानी के लक्षण क्या हैं, यौद्धा कैसा होता है, शिल्पी, दूत, प्रहरी, आदि किसे बनाना चाहिए,,,,, इत्यादि।
पुराने समय में छोटे बच्चे कच्छा नहीँ पहनते थे।
12-13 वर्ष तक के लड़के नँगे घूमते रहते थे।
तब आज जैसी "चेतना" भी नहीं थी।
ज्यादा हुआ तो ऊपर एक शर्ट जैसा कुछ गले में डाल दिया जाता था, शेष भाग हवा लगने को खुला छोड़ दिया जाता था।
बिना कोई समस्या के, लड़के लड़कियां खेलते रहते थे,,,, इत्यादि।
अक्सर, चौपाल पर बैठे दादाजी की गोद में खेलते खेलते पोता भी पहुंच जाता था।
लोग बाग, सामुद्रिक शास्त्र की एक बात कहा करते थे,,,, "सिर बड़ा सपूत का, पैर बड़ा कपूत का।"
यह तो ठीक है, एक और बात कहते थे,,, "काया बड़ी कपूत की,,,"
यहां, काया से तात्पर्य, बच्चे के लिंग की साइज थी।
जिनका जननांग बड़ा होता था वे अच्छी नजर से नहीँ देखे जाते थे। वे इसके लिए गधे और सिंह का उदाहरण देते थे।
मेरी पोस्ट पढ़कर, अभी यहीं कई लोग गधे के गुणगान करना शुरू नहीं करें,,,,, गधा विशाल "काया" धारी होते हुए भी, कभी भी जंगल का राजा नहीं कहलायेगा। और बड़े शक्तिशाली जेबरों के शरीर को सिंहों द्वारा फाड़ दिया जाता है, यह एक सर्वविदित बात है।
"साइज डज मैटर" का नारा देने वाली तीनों सभ्यतायें,,,,  1.अरब, 2.यूरोप, 3.मार्क्स के चिंतन का बहुत बड़ा आधार "जननांग" ही है। खतना आदि प्रथाएं, विज्ञापन-उपभोग, बाह्य सौंदर्य, मुक्त यौन जीवन, से इसे समझ सकते हैं।
जहाँ भी नर-मादा मिले नहीँ कि इसी के इर्द गिर्द चित्रण शुरू हो जाता है।
लिंग बड़ा करने वाले विज्ञापनों पर नजर डालिए,,,,, इन सबका आधार क्या है?
यहाँ किस #सन्तुष्टि की बात हो रही है?
बड़े लिंग वालों ने कहाँ क्या #पराक्रम किया इसका कहीं उदाहरण है?
वे किसी अंडरवियर के प्रचार अथवा कहीं पोर्न फिल्म में नजर आएंगे।
कभी अपने शास्त्रों पर भी भरोसा करना चाहिए।
एकेनापि सुपुत्रेण,
सिंही स्वपिति निर्भयम्।
सहैव दशभिः पुत्रै:
भारम् वहति गर्दभी।।
एक ही पुत्र को जन्म देकर, शेरनी निर्भय होकर सोती है।
जबकि दश पुत्रों की माँ, #गधी अपने पुत्रों सहित बोझा ढोती रहती है।
#kss

शनिवार, 17 जून 2017

मूलनिवासी

एक और मन्त्र है,,,, चत्वारि शृंगा त्रयो अस्य पादा: द्वे शीर्षे सप्त हस्तासोs स्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति,,,,, बड़ा ही प्रसिद्ध मन्त्र है।
जैसा कि वेदार्थ की प्रकृति है,,,, इसके कई अर्थ है।
व्याकरण वालों का अपना अर्थ है, अग्निहोत्रीयों का अपना। राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसकी विस्तृत काव्यशास्त्रीय व्याख्या की है।
दार्शनिकों ने उससे भी सुंदर व्याख्या की है।
सभी शास्त्रज्ञों ने इसकी व्याख्या अपने अपने शास्त्र को वेद सम्मत बताने को की है।
इसका शाब्दिक अर्थ है,,,,
एक बैल है, वह तीन जगह से बंधा है। उसके चार सींग है, तीन पैर है, दो सिर हैं, सात हाथ है। जो कि महा शब्द करता है।
वैयाकरणों की व्याख्या अनुसार तीन सिर ही तीन काल है। सात पैर ही सात विभक्तियाँ हैं। दो सिर, सुबन्त और तिंङन्त है।चार सींग ,,,, नाम, क्रिया, उपसर्ग, निपात आदि हैं।
खैर,,,,,,
एक बार चित्र में दी गई सिंधु घाटी मुद्रा को देखिए।
मूल चित्र net से सर्च कर ध्यान से देखिये। आपको कोई साम्य दिखता है???
इसी चित्र को उलट देने से ब्राह्मी लिपि का ॐ बन जाता है। इसको 90०बायीं ओर घुमाइए,,,, यह #देवनागरी का ॐ बन गया।
कौन कहता है सिंधु लिपि पढ़ी नहीँ जा सकती????
#सिंधुघाटी विशुद्ध आर्य सभ्यता है। सिंधुघाटी की मुद्राएं किसी न किसी वेद मन्त्र का ही चित्रण है।
वेद सिंधु सभ्यता से भी पुराने हैं।
सैन्धव ही आर्य थे। सैन्धव ही #हिन्दू थे।
मूलनिवासियों तुम्हारी ऐसी की तैसी!!
#kss

मंगलवार, 23 मई 2017

हिब्रू कथा

2300 वर्षों से हम दुनिया में भटक रहे हैं, अपनी भूमि से निर्वासित, दर दर की ठोकरें खाते, धन तो बहुत कमाया पर यूरोप के #नवराष्ट्रवाद में कहीं भी हमारी इज्जत नहीं। जिसे जब इच्छा होती है, किसी भी यहूदी को पीट कर चल देता है. सबसे पहले हमें अपनी हिब्रू भाषा को पुनरुज्जीवित करना होगा, जिसे भाषावैज्ञानिकों ने #मृत घोषित कर दिया है! "यह असंभव है!" "प्रकृति विरोधी है!" "कोई साथ नहीं देगा, अकेले मरते रहो!" "तुम 2300वर्षों से बह रही धारा को मोड़ना चाहते हो जो कि एक महानद का रूप ले चुकी है।" किन्तु जगत ने देखा...... थियोडोर हर्ज्ल विचलित नहीं हुआ। #हिब्रूभाषा के पुनरुद्धार में स्वयं को झौंक दिया! 1860 में जन्मे इस युवा आस्ट्रियन हंगेरियन पत्रकार ने 1880 में एक लेख द्वारा इजरायल की स्थापना की प्राकल्पना लिख दी,,, पर धन पशु यहूदियों ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया!! राष्ट्र मरा नहीं करते वे अपनी भाषा में बीज रूप में सुप्त रहते हैं। "मेरा बालक प्रथम हिब्रू भाषी बच्चा होगा!" इस भीषण प्रतिज्ञा के साथ वह सिंह की भाँति कार्यक्षेत्र में उतर गया!! पहला सहयोग अपनी पत्नी से मिला, गर्भकाल से ही उन्होंने घर पर हिब्रू के अतिरिक्त अन्य कोई भाषा का शब्द न बोलने का निर्णय लिया। उन्होंने दुनिया को बताया "देखना, हमारा बच्चा अपना प्रथम शब्द हिब्रू ही बोलेगा, हम तब तक अन्य शब्द की छाया भी नहीं पड़ने देंगे!" परन्तु समस्यायें इतनी ही नहीं थीं!! हिब्रू सम्बन्धी पूर्वधारणाओं का अम्बार था वहाँ। प्रबुद्ध लोग खिल्ली उड़ा रहे थे। यह सब हो गया तो भी तुम कब तक जीवित रहोगे? जब अन्य भाषा से काम चल रहा है तो हिब्रू ही क्यों? हिब्रू तो पवित्र भाषा है, कर्मकाण्ड तक ही ठीक है। ऐसी पवित्र भाषा का लौकिक प्रयोग कर तुम #पाप कर रहे हो!! तुम्हें अपनी सनक के लिये पत्नी और बच्चे की बलि चढाने का कोई अधिकार नहीं!! यह तो देवदूत भाषा (tongue of the prophets) है, हम मनुष्यों के बस की नहीं। तुम धर्म कर्म पौरोहित्य और ओल्ड टेस्टामेंट के बारे में जानते ही क्या हो?? आखिर बच्चा जन्मा। दोनों पति पत्नी वहां घण्टों हिब्रू में ही बात करते। अन्य लोगों को वहाँ आने की अनुमति ही नहीं थी। सामान्य बच्चा 18 माह बाद ही बोलना शुरू कर देता है, पर यहाँ 20 महीने बीत गये!! सभी परिणाम जानने को उतावले थे। पत्नी का धैर्य चुकने लगा!! 24 और फिर 30 माह बीतने को आए!! बच्चे ने एक शब्द नहीं बोला!!!!!! कहीं वह गूंगा तो नहीं????? थियोडोर सैकडों लेख और हजारों भाषणों में यह दावा कर चुका था "कोई भाषा कैसे मृत हो सकती है यदि उसे बोलने वाले विद्यमान हो तो???? यदि कोई पति पत्नी घर में नई भाषा बोलें तो उनकी सन्तति भी जन्मजात वही भाषा बोलेगी और वह उसकी मातृभाषा होगी, और इस तरह से देखना हिब्रू भी जीवित होगी!" तो क्या इस बच्चे को मार दूँ?? वह भीतर तक कांप गया!!!! विगत 20वर्ष से वह हिब्रू का अभ्यास कर रहा था! उसकी पत्नी और मित्रमण्डली ने उस पर विश्वास किया। इन सभी ने खुद की बोली त्याग हिब्रू बोलनी शुरू की। घर घर, गाँव गाँव गए! भूख प्यास, अभाव उपेक्षा सह लोगों को हिब्रू सिखाते रहे। हिब्रू कक्षाएँ चलाईं। शिशुकेन्द्र खोले। शब्दभण्डार रचे। विद्यालयों में हिब्रूमाध्यम लागू करने के आन्दोलन चलाए! गत 45वर्षों की थकान उसे बेहोश करने लगी। तीस महीने से अपने शिशु को सीने से चिपका, उसकी एक एक सांस को महसूस करता मन डोलने लगा! वह रो भी नहीं सकता...... कयों कि रोना तो उसने क्षेत्रीय बोली में सीखा है, न जाने 23 सौ बरस पहले हिब्रू में कैसे #रोते होंगे?? अन्दर का बाँध टूट गया! आंखों से गंगा जमना बहने लगीं। विश्वास की नींव दरकने लगी!! दिशाएँ शून्य होने लगीं। सहसा बालक के गले में कंपन हुआ!! वह बोलने लगा!!! वह बोल रहा था! वह हिब्रू बोल रहा था। थियोडोर की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने बच्चे को छाती से भींच लिया!!!!!! 2300वर्ष बाद हिब्रूभाषी इजराइल राष्ट्र का जन्म हो चुका था । यहूदियों के टोले दुनिया भर से फिलीस्तीन की तरफ बढने लगे!! जरूशलम फिर से आबाद हुआ!! 45वर्ष की साधना करते हुए 1925 में अशक्तता, क्षय रोग, लकवे के बावजूद निरन्तर सक्रिय थियोडोर ने हस्त लिखित आधुनिक हिब्रू साहित्य के कागजों के पहाड़ पर सन्तोष की अन्तिम सांस ली!! भुवमानीताभगवद्भाषा!! उसी का परिणाम है आधुनिक इज़रायल स्वाभिमानी राष्ट्र!!!!! #kss (23.5.2017)

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

जाति ही जाति

कभी भारत विश्वगुरु था, जो ज्ञान परम्परा यहाँ शुरू हुई वह ब्राह्मणों के कारण हुई।
सदियों तक निर्धनता और विपन्नता सहकर भी ब्राह्मणों ने भारत को विश्वगुरु बनाये रखा।
आजादी के बाद ब्राह्मणों को क्या मिला?
थोथे हिंदुत्व ने हमें कुछ न दिया!!!
हम #हिन्दू नहीँ, ब्राह्मण हैं।
जिस हिन्दू से एक मीटर कोपीन और दो मुट्ठी चावल लेकर उसे अमृत के समान ज्ञान देते रहे उसने आज हमें भुला दिया!!
बोलिए ब्राह्मण एकता जिंदाबाद।
हम अखिल भारतीय ब्राह्मण महासम्मेलन बुलाएँगे।
हिंदुत्व की ईंट से ईंट बजाएंगे।
******
कभी भारत विदेशी दुर्दमनीय ताकतों से आक्रांत था।
जनता और संस्कृति के ऊपर खतरा था।
उस समय अपने घर परिवार लुटाकर, महिलाओं को जौहर की अग्नि में सौंप #राजपूतों ने अपना रक्त बहाया।
सदियों तक वे पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ते रहे, मरते रहे। किसी की भी गाय, भैंस बहिन बेटी के लिये अपने मासूम बच्चों को अकेला छोड़ वे मर गए, उनकी पत्नियां सती हो गईं।
पर, आजाद भारत में राजपूतों को क्या मिला?
हिंदुत्व के ठेकेदारों ने हमें क्या दिया???
जिस देश भूमि और संस्कृति के लिये उन्होंने अपना रक्त बहाया वहाँ वे पानी और बिजली तक के लिये तरस रहे हैं,,,,,।
तो,,,, भाड़ में जाये देश, भाड़ में गया हिंदुत्त्व!!
हमारा तो क्षात्र धर्म है।
हम हिन्दू नहीँ हैं।
तो, बोलो जय क्षात्र धर्म। हम हिन्दू हैं ही नहीँ, हम क्षत्रिय हैं,,,, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा इस प्रस्ताव को ऊपर तक उठाएगी!!!
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हम बनियों ने अपने परिश्रम से देश को समृद्धि दी। उसे सोने की चिड़िया बनाया। मठ मंदिर, कुँए धर्मशाला को दान दिया। हारी बीमारी सहायता की और भूल गए।
आजादी के बाद हमें कुछ न मिला।
हमारे टैक्स से हमारी ही मौत का सामान बनता रहा।
काहे का धर्म,,,काहे का देश,,,, जो आया चार लातें मार कर गया।
अखिल भारतीय वैश्य महापरिषद इसका कठोरता से विरोध करती है।
हमें कुछ न दो, पर हमसे कुछ भी मत लो।
हम हिन्दू हैं ही नहीँ,
हम वैश्य हैं,,,, हैं हैं हैं हैं,,,,,
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गर्व से नहीँ, गुस्से से कहो कि हम #दलित हैं।
मूलनिवासी होकर भी हमारा सब कुछ छिन गया। आर्यों ने हमें गुलाम बनाया, खेतों से लेकर शौचालयों तक केवल काम करवाया, समानता से वंचित रखा, जूतों वाली जगह बिठाया, हम कमाते रहे वे खाते रहे मुटियाते रहे,,,, जो मिला उन्हें मिला हमें क्या मिला???
आज भी सबसे ज्यादा गाली हमें मिलती है, भेदभाव होता है,,, पैर समझा जाता है,,,, जन्मना भेदभाव किया जाता है, हमारा आरक्षण छीनने का प्रयत्न हो रहा है,,,,?
हम कोई हिन्दू विन्दू नहीँ, हम मूलनिवासी हैं, हम दलित हैं,,,,,, सब जगह दलित है, वे सब हमारे भाई हैं,
बोलिये दलित एकता जिंदाबाद,,,,,।
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नीचे ये महाभारत चल रहा था।
शिखर की चोटी पर बैठा #बर्बरीक विवश भाव से यह सोच रहा है कि #सबके मन में एक सा भाव, एक सी शिकायत, एक सी जलन, एक सा डाह, एक सा विचार आखिर आया कहाँ से??????
अचानक उसको युद्ध भूमि में कुछ सूक्ष्म जीव तैरते दिखे।
उनके हाथ में कुछ इंजेक्शन थे।
वे ब्राह्मणों की चुटिया उखेड़कर वहाँ एक इंजेक्शन लगाते।
क्षत्रिय की छाती पर डॉट मारते,,,, बनिये की तोंद खोलकर उस में दवाई खोंसते और शूद्रों के पिछवाड़े में दवाई की बत्ती बना घुसेड़ रहे होते।
कहने की जरूरत नहीँ कि वे सूक्ष्म जीवी वामपंथी और चर्च थे।
वे हिंदुत्व, संविधान और भारत नामक तीन शानदार व्यंजनों को सड़ाने के लिये नियुक्त थे।
वे किण्वन क्रिया में रत थे।
एक दूसरे को ताली देते देते, परस्पर मुस्करा कर बड़ी सफाई से, व्यवस्थित तरीके से अपना काम कर रहे थे।
सेनाओं के मध्य मध्य कुछ छोटी टुकड़ियां भी जूझ रही थी।
किसी के रथ पर दर्जी लिखा था किसी के जाट, किसी के पाटीदार था किसी के अहीर, किसी के गुर्जर था किसी के जांगिड़, कोई साटिया था कोई कायस्थ कोई कालबेलिया कोई जोगी कोई वनवासी कोई आदिवासी,,,, 
और एक रथ ऐसा भी था जिसके हरे ध्वज पर चाँद तारा अंकित था।
वह उन व्यंजनों के ताजे ताजे हिस्सों को अपने भाले में लपेटकर रथ में खींचता और खाता जाता।
#kss