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शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

रोहिंग्या मुसलमान

देश बड़ा या इस्लाम,,,,?
इसका उत्तर रोहिंग्या मुसलमानों को समझ आ गया होगा।
दुनिया के 40 इस्लामिक देशों के होते हुए भी #फुटबॉल बने ठोकरें खा रहे हैं।
जो मौलवी बार बार देश से बड़ा इस्लाम होने की डींगें हाँकते थे, और रसूल के बनाए एकमात्र मजहब से ऊपर कुछ नहीं का उद्घोष करते थे उन्हें भी समझ जाना चाहिए कि आगे क्या होने वाला है?
देश तुम्हारे घर जैसा होता है।
वह कोई पब्लिक पार्क या धर्मशाला नहीं।
#रोहिंग्या लोगों ने बर्मा को कभी अपना घर नहीं माना।
वे अरब साम्राज्य की खलीफाई के गुलाम सपनों में जीते रहे और मनमाने तरीके से #म्यांमार में उत्पात मचाने लगे।
बाप का माल समझ सुख सुविधाएं लूटते रहे।
शांतिप्रिय बौद्धों की संपत्ति, बेटियों, अन्न धन को भोगते रहे।
और खा पीकर उसी घर के सभी कक्षों को शौचालय, वैश्यालय, के रूप में उपयोग करके गन्दगी बिखेरते रहे।
शुरू शुरू में बौद्ध भी #बुद्ध के बताए मार्ग पर चलते, मुस्कुराते,,,,, शान्ति छांटी रटते रहे,,,, पर जब उन्हें अपना ही देश छिनते हुए लगा,,,,,! ,,,,,, बुद्ध को किनारे रख पुष्यमित्र शुंग को पकड़ लिया।

रोहिंज्ञों!!
तुमने सोने की मुर्गी को #हलाल करना चाहा,,,, उस मुर्गी ने ड्रैगन का रूप धर तुम्हें ही भगा दिया।
स्वीकार करो कि देश बड़ा है और मजहब उसके बाद,,,,,,!
#kss

सोमवार, 14 अगस्त 2017

भाषण ऐसे दें

भाषण देने के इच्छुक लोगों को कुछ टिप्स बता रहा हूँ।
वैसे तो यह अभ्यास और मौलिकता की बात है।
जहाँ तक हो सके शाब्दिक आडम्बर से बचा जाना चाहिए।
जब भी कोई उर्दू की डायलॉगबाजी करता है या इंग्लिश  छांटता है, मैं समझ जाता हूँ यह कोई खास बात नहीं कह पाएगा।
रटी रटाई शायरी, कुछ प्रसिद्ध धारणाओं या सूक्तियों के सहारे गोल गोल घूमना भाषण बिल्कुल नहीं है!!
अपने समझे हुए मूल विचारों को सरल, स्पष्ट और दृढ़ता से कहना चाहिए और जब लगे कि बात पूरी हो गई तो अनावश्यक लम्बा नहीं खींचना चाहिए।

सुनी सुनाई या रटी रटाई बातों से सदैव परहेज रखें। प्रसंग और तर्क का हमेशा ध्यान रखें, भ्रामक तथ्यों से बचें और अपनी राय को अंतिम सिद्ध करने की कोशिश न करें।
अपने भाषण का मूल्यांकन श्रोताओं को करने दें। उनके #आउटपुट का निरीक्षण करते रहें। पिष्टपेषण से बचें और यथासंभव पुनरुक्त कथन न करें।

आजकल कुछ मोटिवेटर घूमते हुए बोलते हैं, चिल्लाते हैं और मंच पर घूमते किसी ईसाई प्रचारक की तरह आंखें बंद कर मुँह से थूक उछालते हैं, ऐसे #टोटकों से बचना चाहिए।

कुछ प्रसिद्ध भाषणों की वीडियो ऑडियो सुनें। आंचलिक भाषी श्रेष्ठ वक्ताओं को सुनें, और भाषा पर अपनी अच्छी पकड़ बनाएं।
व्याकरण ज्ञान रखे। लघु सूत्र याद करें और बिंदुओं को नोट कर रखें।

यदि आप भारत, भारतीय, राष्ट्र, हिंदुत्व इत्यादि विषय पर बोलना चाहते हैं तो #सत्यार्थ प्रकाश, स्वामी विवेकानंद, पूजनीय गुरुजी आदि के साहित्य को अवश्य पढ़ें। सब पढ़कर फिर अपनी बुद्धि से सोचें।
प्रतिपक्षियों के वैचारिक दर्शन को भी जानें।
थोड़ा सामान्य ज्ञान, थोड़ा विज्ञान, थोड़ा इतिहास, थोड़ा थोड़ा विदेशी प्रसिद्ध दर्शनों का भी अध्ययन करें।

हर मामले में अपनी टांग अड़ाने से बचें और,,,, किसी निश्चित विषय के विशेषज्ञ बनने की दिशा में #प्रवृत्त हों।
इति शुभम।।
#kss

गुरुवार, 2 मार्च 2017

बाहुबलि और नाट्यशास्त्र भाग 2

बाहुबलि और नाट्यशास्त्र भाग 2
क्रमशः अगले सन्ध्यंगों का वर्णन करते है।
गत अंक में प्रतिमुख नामक दूसरी नाट्य सन्धि के 6 अंगों के निरूपण के बाद सातवें अंग से आरम्भ करते है।
7.प्रगमन- बीज के सम्बन्ध में उत्तरोत्तर वचन ही प्रगमन है।
जैसे अवन्तिका का यह कथन कि मेरा शिवा देवसेना को जरूर छुड़ा लाएगा,,,,, यहाँ से लेकर  बाहुबलि शिवा के नगर प्रवेश तक प्रगमन सन्धि अंग है।

8.निरोधन-हित का रुक जाना ही निरोधन है। जैसे भारी सुरक्षा कवच में शिवा का फंस जाना ही निरोधन है।

9.पर्युपासन-क्रुद्ध व्यक्ति को मनाना ही पर्युपासन है।
जैसे भल्लाल देव की प्रतिमा स्थापना में बाहुबलि के जयकारे सुन कर भल्लाल देव अपना आपा खो देता है। तब भद्रा द्वारा आश्वस्ति वचन कि पहरेदारों को बुलाकर पूछते है कि सबसे पहले बाहुबलि का नाम किसने लिया,,,,, यहाँ पर्युपासन है।

10.पुष्प-बीजोद्घाटन में विशेषता युक्त कथन ही #पुष्प है।
देवसेना का यह कथन कि महिष्मति,,,!! मेरा बेटा आ गया है,,,,,, यहाँ पुष्प नामक सन्धि अंग है।

11.उपन्यास- उपाय सहित हेतु प्रदर्शक कथन ही उपन्यास है।
देवसेना से कटप्पा का यह आग्रह कि "राजमाता जल्दी कीजिए, मै आपको छुड़ाने आया हूँ, इससे पहले कि पहरेदार आ जाएं आपको यहाँ से मुक्त करता हूँ,,,," यहाँ उपन्यास नामक सन्धि अंग है।

12.वज्र-प्रत्यक्ष रूप से निष्ठुर कथन ही वज्र कहलाता है।
देवसेना-"मेरा लकड़ियाँ बटोरना तुम्हें पागलपन लगता है,,, कटप्पा,,,,!!!" इस प्रकार निष्ठुर वचन कहने से यहाँ वज्र नामक सन्ध्यंग है।

13.वर्णसंहार- ब्राह्मण आदि चारों वर्णों का एकत्रित होना ही वर्णसंहार है।
भल्लाल देव की प्रतिमा स्थापना समारोह में यह दिखती है।

इसके बाद तीसरी, गर्भ सन्धि के 12अंगोंका वर्णन करते है। #गर्भ में बीज अर्थात् चरम लक्ष्य की प्राप्ति और अप्राप्ति की ऊहापोह होती है। संघर्ष तेज हो जाता है। कार्य जल्दी जल्दी होने लगते है। इसमें कभी कभी पताका नामक छोटी उपकथा जुड़ भी जाती है कहीं कहीं नहीं भी जुड़ती। इसके क्रमशः अंग

1.अभूताहरण-प्रासंगिक विषय से सम्बंधित छलपूर्ण कार्य ही अभूताहरण है।
जैसे बाहुबलि शिवा का नगर में वेश बदल कर प्रवेश और वंचना देना।

2.मार्ग-प्राकृत बात के सन्दर्भ में यथार्थ बात का कथन ही मार्ग कहलाता है।
जैसे भल्लाल के वृद्ध पिता का यह कथन कि लोगों के मन में दबी बात बाहर आई या फिर उन्होंने कुछ देखा?,,,,असम्भव,,,,",,,,इत्यादि।

3.प्राप्ति की आशा में वितर्क से युक्त कथन को रूप कहते है।
जैसे भल्लाल "वे आँखें,,,,, मुझे वह जीवित चाहिए,,,," इत्यादि सम्वाद।

4.उदाहरण-प्राप्त्याशा से सम्बंधित उत्कर्षयुक्त कथन उदाहृति है।

5.क्रम-सोची हुई वस्तु की प्राप्ति क्रम कहलाती है। देवसेना को ले जाने के क्रम में रथ प्रस्तुत करके इसकी योजना की गई है।

6.संग्रह-प्राप्त्याशा से सम्बंध साम और दान से युक्त कथन ही संग्रह है।जैसे "तुममें से सबसे पहले उसका नाम लेते किसने देखा?"
"मैने देखा महाराज!"
स्वयं नायक द्वारा कहे इस कथन में ।

7.अनुमान-किसी चिह्न से किसी बात का निश्चय करना अनुमान कहलाता है।
बेड़ियों में जकड़ी देवसेना की पहचान अनुमान से ही होती है।

8.अधिबल- वंचना या अभिसन्धि, अधिबल कहलाता है। एक सैनिक के वस्त्र पहन अन्तःपुर में घुसना अधिबल है।

9.तोटक-आवेगपूर्ण वचन ही तोटक है।
भल्लाल देव के पुत्र भद्रा द्वारा देवसेना को दुर्वचन कहे जाते है, फलस्वरूप घायल नायक में स्फूर्ति आ जाती है।

10.उद्वेग-शत्रु से उत्पन्न भय उद्वेग कहलाता है। "कटप्पा मुझे बचा लो,,,, यह मुझे मार ही डालेगा " इत्यादि भद्रा की युद्ध प्रसंग में उक्ति।

11.सम्भ्रम-शंका और त्रास को सम्भ्रम कहा गया है। नायक से कटप्पा की लड़ाई में कटप्पा के साथ ऐसा ही होता है।

12.आक्षेप-गर्भ के बीज का प्रकटन ही आक्षेप है। विद्रोही सरदार की यह उक्ति "वे देवसेना के लिए आ रहे है,,,,, रोको उन्हें,,,,!"
इस प्रकार गर्भ नामक तृतीय सन्धि के अंग पूरे होते है।
क्रमशः शेष दो सन्धियों पर आगे लिखेंगे।

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

बाहुबलि और नाट्यशास्त्र

बाहुबलि और नाट्यशास्त्र
धनञ्जय ने #दशरूपक में नाटक के जिन तत्वों का निरूपण किया है उन्हें #bahubali फ़िल्म के सन्दर्भ में  समझते है।
इसके निर्देशक श्री #s.rajamauli की यह अद्भुत कृति है जो लगभग पचास वर्ष तक उनके भाव जगत में उमड़ती रही।
दस प्रकार के रूपकों में यह #नाटक श्रेणी का रूपक है।
इसका नायक प्रख्यात और क्षत्रिय वंशोत्पन्न दिव्य गुणों से युक्त है।
कथावस्तु इतिहास प्रसिद्ध इसलिए है कि #दशकुमारचरित(दण्डी विरचित) में महिष्मति नगरी का वर्णन है।यह अलग बात है कि हम लोग उससे परिचित नहीं है, वृहत् कथा मञ्जरी में इसके कथानक उपस्थित होने से और महाभारत की उपजीव्यता के कारण इसे प्रसिद्ध कहना युक्तियुक्त है।
बाहुबलि के प्रथम भाग में शिवा की कथा आधिकारिक है जबकि अवन्तिका की कथा #पताका श्रेणी की है।
कालिकेय की कथा #प्रकरी श्रेणी की है क्यों कि वह बीच में ही समाप्त हो जाती है।
बीज, बिन्दु, पताका,प्रकरी और कार्य नामक पांच अर्थप्रकृतियां कही गई है।
देवसेना की मुक्ति कार्य है।
इस हेतु अवन्तिका के समूह के प्रथम वार्तालाप में बीज के दर्शन होते है।
फल की इच्छा वाले व्यक्ति के द्वारा आरम्भ किये गये कार्य की पांच अवस्थाएं होती है।
1,आरम्भ
2,यत्न,
3प्राप्त्याशा,
4,नियताप्ति,
5,फलागम
पांच अवस्थाओं से समन्वित होकर पांच अर्थप्रकृतियां ही क्रम से मुख इत्यादि पांच सन्धियां बन जाती है।
वे क्रमशः मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श और उपसंहृति हैं।
इनके क्रमशः 12, 13, 12, 13, और 14 भाग होते है।
इस प्रकार पांचों सन्धियों के कुल 64 भाग होते है, जिनका पालन करने से कोई भी नाटक, महानाटक बन जाता है।
इनके क्रमशः नाम है,,,,
1.उपक्षेप-बीज को शब्दों में रखना ही उपक्षेप है।जैसे बाहुबलि में विद्रोही सरदार जब कहता है, "उन्होंने महिष्मति की मर्यादा महारानी देवसेना को बेड़ियों में जकड़ कर चौराहे पर रखा है।"

2.परिकर-उस बीज की वृद्धि ही परिकर है।
सरदार का यह कथन कि "उस देवसेना की मुक्ति ही हमारा लक्ष्य है।" परिकर नामक सन्ध्यंग है।

3.परिन्यास-उस बीज का अंकुरण ही परिन्यास है। जब अवन्तिका कहती है "सरदार! क्या महाबलि कटप्पा हमारा सहयोग नहीं कर सकते?"

4.विलोभन- गुणों का वर्णन ही विलोभन है। जैसे सरदार कटप्पा की स्वामिभक्ति और निष्ठा की प्रशंसा करता है।

5.युक्ति-प्रयोजनों का निर्णय ही युक्ति है।
जैसे अवन्तिका को सौंपे गये लक्ष्य को शिवा अपना ही प्रयोजन बना लेता है।

6.प्राप्ति-बीज के सम्बन्ध से सुख का प्राप्त होना ही प्राप्ति है।एक लक्षयी, अवन्तिका और शिवा दोनों सुख अनुभव करते हैं।

7.समाधान-बीज का आगमन ही समाधान है।
जब अवन्तिका सरदार को शिवा के बारे में आश्वस्त करती है तो यही समाधान है।

8.विधान-सुख और दुःख दोनों को उत्प्नन करने वाला विधान कहलाता है। जब देवसेना को बेड़ियों में जकड़ा दिखाकर भी उसके रौद्र रूप का दर्शन करवाया जाता है।

9.परिभावना- अद्भुत भाव का समावेश होना ही परिभावना है।
महिष्मति नगर के वर्णन क्रम में इसे समझना चाहिए।

10.उद्भेद- किसी गूढ़ बात को प्रकट करना ही उद्भेद है। जैसे यह कहना कि कटप्पा सहृदय है और देवसेना को मुक्त करवाना चाहता है।

11.करण-प्रस्तुत कार्य का आरम्भ करना करण कहलाता है। शिवा का नगर प्रवेश और उद्योग ही करण है।

12.भेद- प्रोत्साहन को भेद माना गया है। भल्लाल देव की प्रतिमा खड़ी करने में शिवा का प्रोत्साहन ही भेद है।

ये 12 भेद मुख नामक सन्धि के है।
अब प्रतिमुख सन्धि के 13 अंगों का वर्णन करते है।
1.विलास- रति की इच्छा ही विलास है। देवसेना और भल्लाल के वार्तालाप में इसे समझना चाहिए।
2.परिसर्प- पहले देखे गये और फिर नष्ट हुए बीज का अन्वेषण परिसर्प कहलाता है।
अचानक बहल्लाल का तेज बल सामने आने पर ऐसा होता है। बैल के घुटने टेकने के क्रम में।

3.विधूत-बीज की चिन्ता में सुखप्रद पदार्थों के प्रति अरुचि ही विधूत है।
4शम- उस अरति की शांति ही शम है।

5नर्म-परिहास युक्त वचन ही नर्म है।
6.नर्मद्युति-उस परिहास से उत्प्नन धृति ही नर्म द्युति है।
(क्रमशः)