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शनिवार, 16 सितंबर 2017

उसकी जाति, उसकी दुकान

ब्राह्मण,,,,?
जो वास्तव में ब्राह्मण थे, वे तो कभी के आरएसएस जॉइन कर #राष्ट्रवादी बन चुके हैं। वे ब्राह्मणत्व से अधिक अपनी हिन्दू अस्मिता से जाने जाते हैं। ये नाम गोत्र तो उनकी परम्परा के वाहक हैं।
ब्राह्मण है और राष्ट्रवादी नहीं है तो फिर वह ब्राह्मण है ही नहीं।
फिर ये राष्ट्र और आरएसएस के विपरीत चलने वाले कौन है?
ये वही नकली ब्राह्मण हैं जो पण्डावाद फैलाकर पहले भी देश की दुर्गति करवाते रहे और आज भी उसी में लगे हुए हैं।

ये ब्राह्मणों के नाम पर दुकान चलाने वाले देशद्रोही #कलंक हैं।
इन्हें ब्राह्मण कहना ब्राह्मणत्व का अपमान है!!

क्षत्रिय,,,?
जो वास्तव में क्षत्रिय हैं वे राष्ट्रवादी बन आरएसएस जॉइन कर चुके हैं। वे क्षत्रिय से अधिक, स्वयं की हिन्दू पहचान से गौरवान्वित होते हैं। ये नाम गोत्र तो उनकी परम्परा के वाहक हैं।
क्षत्रिय है और राष्ट्रवादी नहीं है,,, ऐसा हो ही नहीं सकता!!
फिर ये कौन है जो राष्ट्र और संघ से विपरीत चल रहे हैं,,,?
ये वही कुलकलंक हैं जिनके कारण देश माता एक सहस्र वर्ष वैधव्य के कलंक को  ढोती रही!
ये पहले भी संदिग्ध थे, ये आज भी संदिग्ध हैं।
ये क्षत्रिय नहीं, नकली क्षत्रिय हैं जो क्षत्रिय के नाम की दुकान चला क्षत्रियों को बदनाम कर रहे हैं!!
इन्हें क्षत्रिय कहना, क्षत्रियत्व का अपमान है!!

वैश्य,,,,?
कहाँ है वैश्य,,,?
जो असली महाजन थे वे तो कब  के राष्ट्रवादी बन चुके हैं। उन्होंने अपनी वैश्य पहचान को त्याग कर हिंदुत्व को स्वीकारा है।
उन्होंने आरएसएस जॉइन कर ली है।
वे वैश्य से अधिक, स्वयं की हिन्दू पहचान से गौरवान्वित होते हैं। ये नाम गोत्र तो उनकी परम्परा के वाहक हैं!!
फिर ये वैश्य के नाम पर पूंगी बजाने वाले कौन हैं?
ये वही परजीवी हैं जो देश संकट के समय भी अपनी तिजोरी भरने में व्यस्त रहे और अपने ही देशवासियों के जख्म में कुलबिलाते कीड़े जिन्हें दिखाई नहीं दिए।
ये वैश्य नहीं, नकली वैश्य हैं जो वैश्यों के नाम पर अलग दुकान चला, वास्तविक वैश्यों को बदनाम कर रहे हैं!!

शूद्र,,,,?
कहाँ है शूद्र,,,,?
जो वास्तविक शुद्र थे वे कब के इस अपमानजनक सम्बोधन वाले आवरण को तोड़, हिन्दू बन चुके हैं। उन्होंने आरएसएस जॉइन कर लिया है। वे स्वयं को शूद्र कहलाना भी पसंद नहीं करते, वे अपनी पहचान हिन्दू के रूप में करवाते हैं।
बल्कि, वे ही वास्तविक हिन्दू हैं। ये नाम गोत्र तो उनकी परम्परा के वाहक हैं !!
फिर ये शूद्रत्व के नाम पर रोज होंगे वाली हाय तौबा कौन कर रहे हैं?
ये वही नकली शूद्र हैं जो पहले भी राष्ट्रसंकट के समय उत्सव मनाते थे, आज भी मनाते हैं।
इन्हें शूद्र कहना, शूद्रत्व का अपमान है। ये तो #शूद्र नाम वाली किसी दुकान के दुकानदार हैं जो खुलकर माल कूट रहे हैं!!
#हिन्दू है और #संघठित नहीं है, उसे हिन्दू मानो ही मत।
वे हिंदुत्व की अच्छाई और बुराई पर दुकान चलाने वाले ढोंगी व्यापारी हैं।
हिन्दू  शरीर से उत्सर्जित कालबाह्य परम्पराओं से उर्वरक बना अपनी अलग फसल काटने वाले इन हिन्दू द्वेषियों को पहचानना ही होगा।
यतो संघस्ततो हिन्दु: ,,,,  हिन्दू धर्मो विजयते !!
#kss

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

पत्र

माननीया,,,,
            वसुंधरा राजे जी,(मु म, राजस्थान) !!
             नमस्ते!
मैं एक नौ वर्ष का #बालक हूँ, और आज आपको यह पत्र लिख रहा हूँ।
       मैं एक सरकारी विद्यालय में चौथी कक्षा में पढ़ता हूँ और छोटे से गाँव में रहता हूँ। आपकी सरकार द्वारा पढ़ाई किताबों में एक जगह लिखा है कि छोटे बच्चों को दूध पीना चाहिए, इसलिए मेरे और दीदी के लिए पिताजी एक गाय लेकर आए! मैंने आज तक चाय को हाथ नहीं लगाया और रोज दूध पीता हूँ।
अभी हमारी गायों की संख्या पाँच हो गई है और वे भादो के महीने में भी घर के बाड़े में दिन भर बन्द रहती है।  कारण,,,,  चारों ओर की सरकारी भूमि और गोचर पर लोगों ने तारबन्दी कर अवैध खेती कर रखी है।
महोदया!!
          ये अवैध खेती वाले रात को तारबन्दी में करंट छोड़ते हैं, दिन को लट्ठ लेकर गायों को भगाते हैं, ट्रैक्टर पीछे दौड़ाते हैं, कई पशुओं को पकड़ कर धातु की तार से मुँह बाँध देते हैं।इससे प्रतिदिन कई गाय, बैल, बछड़े, ऊंट, उंटनियाँ, आदि मर रहे हैं, अपँग हो रहे हैं और सड़कों पर आकर जम जाते हैं।
महोदया,,,!!
स्थिति यह है कि उल्टे ये लोग आकर हमें धमकाते हैं और कानूनी कार्रवाई की धमकी देते हैं।
अब मेरे पिताजी इन सब गायों को बेचना चाहते हैं किंतु कोई भी लेने को तैयार नहीं। गौशाला वालों ने भी मना कर दिया, हमारे पुष्तैनी पण्डित जी, रिश्तेदार और निकट सम्बन्धियों को फ्री में देनी चाही पर सबने मना कर दिया!!
पहले हमारी गायों में एक ग्वाला होता था जो कुछ चराई के बदले गायें चरा लाता था, किन्तु इस वर्ष ग्वाला कोई तैयार ही नहीं हो रहा है, क्योंकि जब खुली जमीन ही नहीं है तो वह कहाँ लेकर जाए?
आज जिनके पास गाय नहीं, वे बड़े खुश हैं और हमारी मजाक भी उड़ाते हैं, हमारी दुर्गति देखकर!!
महोदया!!
आप धार्मिक हैं और मंदिरों में जाती हैं, ऐसा हमने सुना है। ये देवी देवता आपकी सुनते भी होंगे।
महोदया,,,!
उन देवताओं से कहना कि हमारी गायों को अपने पास ले जाएं क्योंकि यहाँ अब उनके रहने, चरने, फिरने की जगह ही नहीं बची। हम बिना दूध के रह लेंगे। हम उस पाठ को पढेंगे ही नहीं, जिसमें दूध पीने का लिखा है। हम अपनी टीचर को भी मना लेंगे कि वह हमें #गाय पर लेख रटाना बन्द करे। मैं अपने पिताजी की अलमारी में रखी #गौदान पुस्तक को भी चुपके से जला दूँगा।
महोदया,,,!
मैंने पढ़ा है कि #राजस्थान का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा है। यहाँ भी जब भूमि की यह स्थिति है तो दूसरी जगह तो और भी बुरी स्थिति होगी, और वहाँ जब गायें हैं ही नहीं तो ये,,,,,, शहर में दूध कहाँ से आता है ,,,?,,,,,यह मेरे लिए अभी भी रहस्य है ।
मैंने सुना है कि गायों के लिए लड़ते हुए कई लोगों ने अपना बलिदान दे दिया।
मैं 9 साल का बालक अभी तो नहीं लड़ सकता, पर जब देखता हूँ कि बड़े भी नहीं लड़ रहे, तो समझ नहीं पाता कि उनकी क्या मजबूरी है?
मेरा वोट भी नहीं है। मेरी गायें भी वोट नहीं दे सकती।
आप तक बात पहुंचाने का यह आइडिया मेरा ही है और पिताजी ने वही लिखा है जो मैं उन्हें कह रहा हूँ।
महोदया,,,!
हो सके तो कुछ कीजिए। अवसर सबको नहीं मिलता!!
आपका
#हर्षवर्धन

सेक्युलर भक्ति

सेक्युलर भक्ति , #भक्ति न भवति।
उपासना पध्दतियों का घालमेल सबसे बड़ा पाखण्ड है।
यह एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति ,,,, वेदवाक्य का सबसे बड़ा मजाक है। यह उसी श्रृंखला का एक षड्यंत्र है,,, जिसमें भारतीय मूल्यों की चाशनी में जहर घोल कर भारत को पिलाया।
गांधी बाबा ने ईश्वर अल्ला तेरो नाम,,,,, गाया।
वर्षों तक सर्वोदयी लोग "सर्वधर्म प्रार्थना" का राग गाते थे,,, गाते रहे। #गांधी गान का परिणाम यह हुआ कि लगभग सभी भारतीय मन्दिरों में, भरी भीड़ के सामने यीशु, श्रीकृष्ण, मोहम्मद, ईश्वर, अल्ला, देवी आदि को #एक बताने के नारे लगाए जाते रहे हैं।
कबीर और गाँधी लाख एका रटते रहें,,,, पर क्या वे अपने इस नारे को किसी मस्जिद या चर्च में लगवा सके?
क्या पाकिस्तान में कोई एक भी जिंदा सर्वोदयी उस एका गान को गाता है? गाना तो क्या,,, कोई सहमत भी है?
मुस्लिम गुंडागर्दी से त्रस्त गाँधी और कबीर ने सेक्युलर भक्ति की खोज की जिसे मुस्लिम ईसाइयों ने ठुकरा दिया पर हिन्दू तीर्थ अवश्य प्रदूषित हो गए!!
जैसी कि परम्परा रही है, सभी दुर्भाग्य के #भूत हिंदुओं के ही पीछे लगाए जाते हैं।
उपासना नितांत व्यक्तिगत विषय है, इसमें सामुहिक घालमेल राजनीति और षडयंत्र वश किया जाता है। जो कि नहीं होना चाहिए।
वह सबसे बड़ा ढोंगी है जो सभी मजहबों को समान बताता है।
वे सबसे बड़े पाखण्डी हैं जो ईश्वर अल्ला एक होने और भजने की बात करते हैं।
जब कोई ऐसा कह रहा है, उसका यह अर्थ है कि वह मात्र हिंदुओं पर चोट करने का एक नया उपाय मात्र कर रहा है।
कबीर के समय युग की मांग थी, हालांकि बाद में स्वयं कबीर ने इसके रहस्य को खोला जिसे जानने की जरूरत है। गाँधी तो नाम ही मजबूरी का है।
वर्तमान मजबूत हिंदुत्व की ऐसी कोई मजबूरी नहीं।
सेक्युलर भक्ति, भक्ति नहीं जाल है, तुम्हें #फांसने का।
#kss

शनिवार, 17 जून 2017

मूलनिवासी

एक और मन्त्र है,,,, चत्वारि शृंगा त्रयो अस्य पादा: द्वे शीर्षे सप्त हस्तासोs स्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति,,,,, बड़ा ही प्रसिद्ध मन्त्र है।
जैसा कि वेदार्थ की प्रकृति है,,,, इसके कई अर्थ है।
व्याकरण वालों का अपना अर्थ है, अग्निहोत्रीयों का अपना। राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसकी विस्तृत काव्यशास्त्रीय व्याख्या की है।
दार्शनिकों ने उससे भी सुंदर व्याख्या की है।
सभी शास्त्रज्ञों ने इसकी व्याख्या अपने अपने शास्त्र को वेद सम्मत बताने को की है।
इसका शाब्दिक अर्थ है,,,,
एक बैल है, वह तीन जगह से बंधा है। उसके चार सींग है, तीन पैर है, दो सिर हैं, सात हाथ है। जो कि महा शब्द करता है।
वैयाकरणों की व्याख्या अनुसार तीन सिर ही तीन काल है। सात पैर ही सात विभक्तियाँ हैं। दो सिर, सुबन्त और तिंङन्त है।चार सींग ,,,, नाम, क्रिया, उपसर्ग, निपात आदि हैं।
खैर,,,,,,
एक बार चित्र में दी गई सिंधु घाटी मुद्रा को देखिए।
मूल चित्र net से सर्च कर ध्यान से देखिये। आपको कोई साम्य दिखता है???
इसी चित्र को उलट देने से ब्राह्मी लिपि का ॐ बन जाता है। इसको 90०बायीं ओर घुमाइए,,,, यह #देवनागरी का ॐ बन गया।
कौन कहता है सिंधु लिपि पढ़ी नहीँ जा सकती????
#सिंधुघाटी विशुद्ध आर्य सभ्यता है। सिंधुघाटी की मुद्राएं किसी न किसी वेद मन्त्र का ही चित्रण है।
वेद सिंधु सभ्यता से भी पुराने हैं।
सैन्धव ही आर्य थे। सैन्धव ही #हिन्दू थे।
मूलनिवासियों तुम्हारी ऐसी की तैसी!!
#kss

मंगलवार, 23 मई 2017

हिब्रू कथा

2300 वर्षों से हम दुनिया में भटक रहे हैं, अपनी भूमि से निर्वासित, दर दर की ठोकरें खाते, धन तो बहुत कमाया पर यूरोप के #नवराष्ट्रवाद में कहीं भी हमारी इज्जत नहीं। जिसे जब इच्छा होती है, किसी भी यहूदी को पीट कर चल देता है. सबसे पहले हमें अपनी हिब्रू भाषा को पुनरुज्जीवित करना होगा, जिसे भाषावैज्ञानिकों ने #मृत घोषित कर दिया है! "यह असंभव है!" "प्रकृति विरोधी है!" "कोई साथ नहीं देगा, अकेले मरते रहो!" "तुम 2300वर्षों से बह रही धारा को मोड़ना चाहते हो जो कि एक महानद का रूप ले चुकी है।" किन्तु जगत ने देखा...... थियोडोर हर्ज्ल विचलित नहीं हुआ। #हिब्रूभाषा के पुनरुद्धार में स्वयं को झौंक दिया! 1860 में जन्मे इस युवा आस्ट्रियन हंगेरियन पत्रकार ने 1880 में एक लेख द्वारा इजरायल की स्थापना की प्राकल्पना लिख दी,,, पर धन पशु यहूदियों ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया!! राष्ट्र मरा नहीं करते वे अपनी भाषा में बीज रूप में सुप्त रहते हैं। "मेरा बालक प्रथम हिब्रू भाषी बच्चा होगा!" इस भीषण प्रतिज्ञा के साथ वह सिंह की भाँति कार्यक्षेत्र में उतर गया!! पहला सहयोग अपनी पत्नी से मिला, गर्भकाल से ही उन्होंने घर पर हिब्रू के अतिरिक्त अन्य कोई भाषा का शब्द न बोलने का निर्णय लिया। उन्होंने दुनिया को बताया "देखना, हमारा बच्चा अपना प्रथम शब्द हिब्रू ही बोलेगा, हम तब तक अन्य शब्द की छाया भी नहीं पड़ने देंगे!" परन्तु समस्यायें इतनी ही नहीं थीं!! हिब्रू सम्बन्धी पूर्वधारणाओं का अम्बार था वहाँ। प्रबुद्ध लोग खिल्ली उड़ा रहे थे। यह सब हो गया तो भी तुम कब तक जीवित रहोगे? जब अन्य भाषा से काम चल रहा है तो हिब्रू ही क्यों? हिब्रू तो पवित्र भाषा है, कर्मकाण्ड तक ही ठीक है। ऐसी पवित्र भाषा का लौकिक प्रयोग कर तुम #पाप कर रहे हो!! तुम्हें अपनी सनक के लिये पत्नी और बच्चे की बलि चढाने का कोई अधिकार नहीं!! यह तो देवदूत भाषा (tongue of the prophets) है, हम मनुष्यों के बस की नहीं। तुम धर्म कर्म पौरोहित्य और ओल्ड टेस्टामेंट के बारे में जानते ही क्या हो?? आखिर बच्चा जन्मा। दोनों पति पत्नी वहां घण्टों हिब्रू में ही बात करते। अन्य लोगों को वहाँ आने की अनुमति ही नहीं थी। सामान्य बच्चा 18 माह बाद ही बोलना शुरू कर देता है, पर यहाँ 20 महीने बीत गये!! सभी परिणाम जानने को उतावले थे। पत्नी का धैर्य चुकने लगा!! 24 और फिर 30 माह बीतने को आए!! बच्चे ने एक शब्द नहीं बोला!!!!!! कहीं वह गूंगा तो नहीं????? थियोडोर सैकडों लेख और हजारों भाषणों में यह दावा कर चुका था "कोई भाषा कैसे मृत हो सकती है यदि उसे बोलने वाले विद्यमान हो तो???? यदि कोई पति पत्नी घर में नई भाषा बोलें तो उनकी सन्तति भी जन्मजात वही भाषा बोलेगी और वह उसकी मातृभाषा होगी, और इस तरह से देखना हिब्रू भी जीवित होगी!" तो क्या इस बच्चे को मार दूँ?? वह भीतर तक कांप गया!!!! विगत 20वर्ष से वह हिब्रू का अभ्यास कर रहा था! उसकी पत्नी और मित्रमण्डली ने उस पर विश्वास किया। इन सभी ने खुद की बोली त्याग हिब्रू बोलनी शुरू की। घर घर, गाँव गाँव गए! भूख प्यास, अभाव उपेक्षा सह लोगों को हिब्रू सिखाते रहे। हिब्रू कक्षाएँ चलाईं। शिशुकेन्द्र खोले। शब्दभण्डार रचे। विद्यालयों में हिब्रूमाध्यम लागू करने के आन्दोलन चलाए! गत 45वर्षों की थकान उसे बेहोश करने लगी। तीस महीने से अपने शिशु को सीने से चिपका, उसकी एक एक सांस को महसूस करता मन डोलने लगा! वह रो भी नहीं सकता...... कयों कि रोना तो उसने क्षेत्रीय बोली में सीखा है, न जाने 23 सौ बरस पहले हिब्रू में कैसे #रोते होंगे?? अन्दर का बाँध टूट गया! आंखों से गंगा जमना बहने लगीं। विश्वास की नींव दरकने लगी!! दिशाएँ शून्य होने लगीं। सहसा बालक के गले में कंपन हुआ!! वह बोलने लगा!!! वह बोल रहा था! वह हिब्रू बोल रहा था। थियोडोर की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने बच्चे को छाती से भींच लिया!!!!!! 2300वर्ष बाद हिब्रूभाषी इजराइल राष्ट्र का जन्म हो चुका था । यहूदियों के टोले दुनिया भर से फिलीस्तीन की तरफ बढने लगे!! जरूशलम फिर से आबाद हुआ!! 45वर्ष की साधना करते हुए 1925 में अशक्तता, क्षय रोग, लकवे के बावजूद निरन्तर सक्रिय थियोडोर ने हस्त लिखित आधुनिक हिब्रू साहित्य के कागजों के पहाड़ पर सन्तोष की अन्तिम सांस ली!! भुवमानीताभगवद्भाषा!! उसी का परिणाम है आधुनिक इज़रायल स्वाभिमानी राष्ट्र!!!!! #kss (23.5.2017)

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

जाति ही जाति

कभी भारत विश्वगुरु था, जो ज्ञान परम्परा यहाँ शुरू हुई वह ब्राह्मणों के कारण हुई।
सदियों तक निर्धनता और विपन्नता सहकर भी ब्राह्मणों ने भारत को विश्वगुरु बनाये रखा।
आजादी के बाद ब्राह्मणों को क्या मिला?
थोथे हिंदुत्व ने हमें कुछ न दिया!!!
हम #हिन्दू नहीँ, ब्राह्मण हैं।
जिस हिन्दू से एक मीटर कोपीन और दो मुट्ठी चावल लेकर उसे अमृत के समान ज्ञान देते रहे उसने आज हमें भुला दिया!!
बोलिए ब्राह्मण एकता जिंदाबाद।
हम अखिल भारतीय ब्राह्मण महासम्मेलन बुलाएँगे।
हिंदुत्व की ईंट से ईंट बजाएंगे।
******
कभी भारत विदेशी दुर्दमनीय ताकतों से आक्रांत था।
जनता और संस्कृति के ऊपर खतरा था।
उस समय अपने घर परिवार लुटाकर, महिलाओं को जौहर की अग्नि में सौंप #राजपूतों ने अपना रक्त बहाया।
सदियों तक वे पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ते रहे, मरते रहे। किसी की भी गाय, भैंस बहिन बेटी के लिये अपने मासूम बच्चों को अकेला छोड़ वे मर गए, उनकी पत्नियां सती हो गईं।
पर, आजाद भारत में राजपूतों को क्या मिला?
हिंदुत्व के ठेकेदारों ने हमें क्या दिया???
जिस देश भूमि और संस्कृति के लिये उन्होंने अपना रक्त बहाया वहाँ वे पानी और बिजली तक के लिये तरस रहे हैं,,,,,।
तो,,,, भाड़ में जाये देश, भाड़ में गया हिंदुत्त्व!!
हमारा तो क्षात्र धर्म है।
हम हिन्दू नहीँ हैं।
तो, बोलो जय क्षात्र धर्म। हम हिन्दू हैं ही नहीँ, हम क्षत्रिय हैं,,,, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा इस प्रस्ताव को ऊपर तक उठाएगी!!!
*****
हम बनियों ने अपने परिश्रम से देश को समृद्धि दी। उसे सोने की चिड़िया बनाया। मठ मंदिर, कुँए धर्मशाला को दान दिया। हारी बीमारी सहायता की और भूल गए।
आजादी के बाद हमें कुछ न मिला।
हमारे टैक्स से हमारी ही मौत का सामान बनता रहा।
काहे का धर्म,,,काहे का देश,,,, जो आया चार लातें मार कर गया।
अखिल भारतीय वैश्य महापरिषद इसका कठोरता से विरोध करती है।
हमें कुछ न दो, पर हमसे कुछ भी मत लो।
हम हिन्दू हैं ही नहीँ,
हम वैश्य हैं,,,, हैं हैं हैं हैं,,,,,
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गर्व से नहीँ, गुस्से से कहो कि हम #दलित हैं।
मूलनिवासी होकर भी हमारा सब कुछ छिन गया। आर्यों ने हमें गुलाम बनाया, खेतों से लेकर शौचालयों तक केवल काम करवाया, समानता से वंचित रखा, जूतों वाली जगह बिठाया, हम कमाते रहे वे खाते रहे मुटियाते रहे,,,, जो मिला उन्हें मिला हमें क्या मिला???
आज भी सबसे ज्यादा गाली हमें मिलती है, भेदभाव होता है,,, पैर समझा जाता है,,,, जन्मना भेदभाव किया जाता है, हमारा आरक्षण छीनने का प्रयत्न हो रहा है,,,,?
हम कोई हिन्दू विन्दू नहीँ, हम मूलनिवासी हैं, हम दलित हैं,,,,,, सब जगह दलित है, वे सब हमारे भाई हैं,
बोलिये दलित एकता जिंदाबाद,,,,,।
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नीचे ये महाभारत चल रहा था।
शिखर की चोटी पर बैठा #बर्बरीक विवश भाव से यह सोच रहा है कि #सबके मन में एक सा भाव, एक सी शिकायत, एक सी जलन, एक सा डाह, एक सा विचार आखिर आया कहाँ से??????
अचानक उसको युद्ध भूमि में कुछ सूक्ष्म जीव तैरते दिखे।
उनके हाथ में कुछ इंजेक्शन थे।
वे ब्राह्मणों की चुटिया उखेड़कर वहाँ एक इंजेक्शन लगाते।
क्षत्रिय की छाती पर डॉट मारते,,,, बनिये की तोंद खोलकर उस में दवाई खोंसते और शूद्रों के पिछवाड़े में दवाई की बत्ती बना घुसेड़ रहे होते।
कहने की जरूरत नहीँ कि वे सूक्ष्म जीवी वामपंथी और चर्च थे।
वे हिंदुत्व, संविधान और भारत नामक तीन शानदार व्यंजनों को सड़ाने के लिये नियुक्त थे।
वे किण्वन क्रिया में रत थे।
एक दूसरे को ताली देते देते, परस्पर मुस्करा कर बड़ी सफाई से, व्यवस्थित तरीके से अपना काम कर रहे थे।
सेनाओं के मध्य मध्य कुछ छोटी टुकड़ियां भी जूझ रही थी।
किसी के रथ पर दर्जी लिखा था किसी के जाट, किसी के पाटीदार था किसी के अहीर, किसी के गुर्जर था किसी के जांगिड़, कोई साटिया था कोई कायस्थ कोई कालबेलिया कोई जोगी कोई वनवासी कोई आदिवासी,,,, 
और एक रथ ऐसा भी था जिसके हरे ध्वज पर चाँद तारा अंकित था।
वह उन व्यंजनों के ताजे ताजे हिस्सों को अपने भाले में लपेटकर रथ में खींचता और खाता जाता।
#kss

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

इतिहास और वे

मेरा बचपन बहुत निर्धनता में बीता।
और उन कठिन दिनों में भी ईश्वर प्रदत्त बुद्दि ने मुझे पढ़ने की तीव्र लालसा युक्त शक्ति दी। जब जहां से कोई चिन्दी भी मिलती, जिस पर कुछ लिखा हो, मै पढ़ लिया करता।
चौथी पांचवीं में पढ़ते हुए, मैने उपलब्ध 8वीं तक की पुस्तकें पढ़ ली थी।
सहपाठियों के पास उपलब्ध "अतिरिक्त" प्रिंट सामग्री तो मेरा प्रिय आहार था।
यदि कभी कोई बड़ी पुस्तक या पुस्तकालय का मौका मिला तो मै, डूब जाता उसमें।
मेरे ताऊजी के पास भी पुस्तकों का अच्छा संग्रह था, मैने उसको छान डाला।
पुस्तकें पढ़ते पढ़ते मुझ में इतनी हीन भावना आ गई थी कि, संसार दुःखमय प्रतीत होता।
मै, सन्यासी बनने की सोचता।
इतिहास मुझे बहुत निराश करता।
खास कर मध्यकालीन इतिहास कक्षा 7 के वर्णन में ही मुझे लग गया था कि कहीं कोई भारी गड़बड़ हो रही है।
भारतीय इतिहास का जैसा मनहूस और उबाऊ चित्रण था, उसे जानकर मुझे घोर निराशा हुई।
#बाबर के आक्रमण और राणा सांगा की पराजय का वृतांत सुनकर मुझे बेचैनी होने लगी।
और प्रश्नोत्तर में हमें, बाबर के व्यक्तित्व के मूल्यांकन में उसकी विरुदावलियाँ रटाई जाती।
यह 12वर्ष के बालमन पर घोर अत्याचार था।
उसके बाद मैने, पाठ्यक्रम की जितनी भी पुस्तकें पढ़ी, उन्होंने मुझे बहुत बहुत निराश किया।
हरेक प्रकरण, ऐसा लगता मेरी शक्ति के अंश को घटाता ही जा रहा है।
हताश, निराश, कुंठित और स्वयं को बहुत अकिंचन मानते हुए, जीवन के भार को किसी तरह ढो कर चल रहा था।
न कोई उमंग न कोई तरंग।जिंदगी कटी पतंग।
सचमुच, बहुत त्रास और अपमान युक्त बचपन व्यतीत किया मैने।
जब विचार शक्ति आई, और मुझे पता चला कि हम सूर्यवंशी हैं, मैने फिर से पढ़ना शुरु किया।
यह कि किस प्रकार हमारा वंश सूर्य से आरम्भ हुआ और उसके निहितार्थ क्या हैं, जानकर मै और भीतर तक प्रविष्ट हुआ।
और, उन बातों को पाठ्यक्रम में न जानकर मुझे किसी षड्यंत्र की दुर्गन्ध आने लगी।
मैने, संस्कृत पढ़ने का निश्चय किया।
#सन्यास का विचार स्थगित कर दिया।
।
मै, पुस्तकों के पहाड़ पर टूट पड़ा!!
वेद से शिवराज विजय पर्यन्त, सांख्य से दयानन्द तक, और जब जो तत्व की पुस्तक दिखी, पढ़ डाली।
मुझे, #हस्तामलकवत सारा दृश्य समझ आने लगा।
मै, जान गया कि हमने बड़े बड़े साम्राज्य जीत कर दान में दे दिये थे।
मुझे सरकारों द्वारा कुछ "देने" की प्रवृत्ति पर दया आती।

हमारे पूर्वजों ने भूमण्डल को खोद कर रख दिया था, मुझे आश्चर्य होता कि आज भी कुछ लोग तालाब से एक तसल्ला मिट्टी निकाल कर चैनल से डिबेट करवाते।

मेरे, जनकों ने पूरे वंश ही धर्म रक्षा हेतु समर्पित कर दिये थे, और आज सरकार के कोई नुमाइन्दे जीप से 100किमी दौरा भर करते हैं तो उनके इस "शारीरिक" त्याग पर तालियां बजती हैं।

कभी इस देश में जीते जी अपना माँस काट कर परोपकार हेतु फेंक गया, आज नेताजी एक दिन का वेतन दे दें तो समाचार बनता है।

गायों की रक्षार्थ जिनके सिर कट गये और धड़ लड़ते रहे, उनसे सब्सिडी के फॉर्म भरवाये जा रहे हैं।
और मुझे इस प्रपञ्च पर कभी आश्चर्य नहीं हुआ।
त्याग क्या होता है और उसको कैसे किया जाता है, मै समझ चुका हूँ।
राष्ट्रभक्ति क्या है और उसे कैसे भोंथरा बनाया जाता है, मै जान चुका हूँ।
जान चुका हूँ कि कैसे, शक्कर को अल्कोहोल में बदला जाता है।
यह भी कि हवन में आहुति देने की मानसिकता वाला कैसे, यज्ञपात्र की चोरी को भी तैयार हो जाता है।
उस खेल को बहुत सूक्ष्मता से जान गया जिसमें पिंजरे में शेर डाल कर भेड़ निकाली जाती है।
इस बाजी को पलटना भी सीख गया हूँ।
।पर हे इतिहासकारों!!
तुमने, न जाने क्या सोचकर छल किया मेरे साथ।
मेरे स्वर्णिम बचपन में निराशा का जहर घोलने वाले तुम अक्षम्य हो।
मै, अतिक्रान्त कर गया तुम्हारे तिलिस्मी घेरे को, पर तुमने अपने यांत्रिक पिंजरे में करोड़ों बच्चों को उम्र भर के लिए कैद कर लिया।
हम, अपने सात पुश्तों के सम्माननीय ब्राह्मणों को गालियां देकर, तुम्हारे वाक्यों को रटते रहे और तुम हमारे ही साथ धोखा करते रहे।
तुम ने करोड़ों अपंग भ्रूण पैदा किये जो अपनी जड़ों से कट कर रीढ़ विहीन, परजीवी बन कर रेंग रहे हैं।
तुम ने मात्र अपने मनोरंजन के लिए मानसिक अपंगों की एक विशाल सेना तैयार कर दी जो रात दिन, तुम्हारे इशारे पर अपने टेढ़े, फूले हुए अंगों को वीभत्स तरीके से हिलाकर, मृत्यु का इंतजार कर रही है।
तुम, मेरे एकमात्र आश्रय स्थल की तबाही का उच्चाटन कर रहे हो, मै तुम्हारे वध का पुण्य क्यों न लूँ?
#kss

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

ऊर्जा

जब असत्य का साम्राज्य होता है तो, ऊर्जा का व्यय अधिक होता है।
शक्ति का क्षय होता है।
और पराजय होती है।

पुराने घर में, यह होता था कि बाह्य ऊर्जा का सुंदर व्यवस्थापन किया जाता था। गर्मियों में बाहरी अतिरिक्त गर्मी प्रविष्ट नहीं होती थी और सर्दियों में आंतरिक ऊष्मा बाहर निक्षेपित नहीं होती थी।
पुराने घरों में अलाव जलाने की व्यवस्था होती थी।
आधुनिक कमरों में, सर्दी में बाहरी ऊष्मा या अलाव नहीं हो पाता तो उसके लिए हीटर आदि द्वारा ऊर्जा का अतिरिक्त व्यय होता है।
गर्मी में सीमेंट की दीवार मिटटी के समान ऊष्मा कुचालक नहीं होने से, ac आदि द्वारा अतिरिक्त उर्जा का अपव्यय किया जाता था।
हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे, जो ऐसी प्रणाली विकसित कर गए कि ऊर्जा का संरक्षण होता रहे।
यह हर क्षेत्र में, सर्वव्यापक बात थी।
#सत्यमेव_जयते का वाक्य इसका ही सैद्धांतिक स्वरूप था।
सत्य को किसी अतिरिक्त संरक्षण की आवश्यकता नहीं होती।
लीपापोती में और तथ्य घुमाने में कितनी ताकत लगती है, यह सारा प्रपञ्च और तिकड़म उस असत्य के बचाव में ही तो आता है, जिसे आप पहले स्थापित कर चुके होते हैं।
जितना बड़ा संविधान, अर्थात सत्य धकेलने के उतने ही उपाय।
जितनी बड़ी बहस, अर्थात असत्य आरोपण की उतनी ही युक्तियाँ।
जितना अधिक विमर्श, सत्य से दूर भागने के उतने ही बहाने।
और #शक्ति का अपव्यय।
पहले सीमेंटेड मकान बना कर समस्या उत्पाद करना और फिर उसे मिटाने हेतु, आजीवन शक्ति व्यय करना जिससे कभी भी मुक्त चिंतन का समय ही न मिले।
आधुनिक, मजहब, जिनमें मार्क्सवाद भी शामिल है, सभी भारत के लिए अनुकूल नहीं है, उसका कारण यही है।
शक्ति तो नियत प्रमाण में ही है, और मानव आयु बहुत अल्प, अतः ये प्रयोग और प्रगति की नौटँकीयां सुख की बजाय दुःख जनती है।
यहाँ, गाय को जबरदस्ती माँसाहार खिलाने के और शेरों को धनिया-पुदीना की चटनी चटाने के खेल चालू हो चुके हैं।
इससे बीमारी फैलेगी, तब औषधि बिकेगी, और मेडिकल कारोबार मजबूत होगा, पर अंततः ऊर्जा की बर्बादी हुई और हाथ कुछ न आया।

सैक्स और भोजन की जो परिभाषा वामपंथ ने दी है, वह बहुत संकीर्ण और अप्राकृतिक है, इसलिये कि मानव एक समाजिक प्राणी मात्र नहीं है।वह animal से बहुत आगे की चीज है।
नर और मादा विभाजन से आगे भी बढ़ो।
अगली सीढ़ी के बारे में सोचो।

कन्हैया जैसे लड़कों को फंसाकर, उस प्रकरण को तूल देकर, काँग्रेस भिंडरावाला की पुनरावृत्ति कर रही है।
यह लघुपथ बाद में बहुत सी एनर्जी की मांग करेगा। आपके किसी #बड़े की आहूति भी मांग सकता है।
#kss