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शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

पाखण्ड

कहानी एक
त"तुम अपने आप को भगवान के चरणों में समर्पित कर दो,,,!"
और वह समर्पण के लिए पास सरक आई।
"ध्यान रहे,,,, समर्पण में प्रश्न नहीं होता,,,, कोई शंका है तो गुफा से बाहर छोड़ आओ,,,!"
उसने शंका और प्रश्न बाहर छोड़ दिए।
"यह शरीर तुम नहीं हो,,,, तुम नित्य शुद्ध चैतन्य आत्मा हो,,,, आत्मा मलिन नहीं होती। इस मल मूत्र से भरे शरीर की चिंता न करो,,,,!"

वह शरीर भूलती जा रही थी।
अंधेरे का तिलिस्म बढ़ता जा रहा था।
फिर भी उसने आंखें बंद कर रखी थी।

"अब जो तुमको स्पर्श होगा न वह आद्यात्मिक मिलन की प्रथम सीढ़ी है। यह केवल सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करने का अनुष्ठान मात्र है।,,,,, डरना नहीं,,,, बिल्कुल मत घबराना। इसके बाद तुम्हारा ब्रह्मरन्ध्र खुल जायेगा।,,,, तुम समाधि अवस्था में पहुंचने वाली हो,,,, तुम्हारा परलोक सुधर जाएगा,,,,,"
ओके,,,,, अंधेरा,,,,,, चीख,,,,,, समाप्त।

कहानी 2
"जब तक तुम अपने दिमाग को खोलोगी नहीं, दकियानूसी चीजें तुम्हें परेशान करती रहेंगी। मैं नहीं चाहता कि कोई  नैरो माइंड लड़की अपने अधकचरे नॉलेज से मार्क्स को बदनाम करे,,,,"

और वह खुलने लगी।उसने पैग खत्म किया और सर का मुँह देखने लगी।
"जब तक इस खूबसूरत बदन को पोगापंथी चीथड़ों में लपेट के रहोगी,,, समाजवाद की abcd भी नहीं समझोगी।"
उसके वस्त्र अब अस्तव्यस्त होने लगे।

"जब तक सतीत्व,,,, वर्जिनिटी,,,, जैसी थोथी बातों में उलझी रहोगी,,,, तुम्हारे रिसर्च में पैनापन नहीं आ पाएगा। देखो,,,, मैं हरेक को कहता हूँ,,,, चीजों को खुलकर करो,,,,, एन्जॉय इट,,,!"

उसने उठकर लाइट बन्द कर दी।

"अब जो होगा वह बिल्कुल नैचुरल घटना है,,,, डरने की कोई बात नहीं,  इसके बाद तुम एन्जॉय करने वाली सच्ची कामरेड बन जाओगी।  यह तुम्हारे भावी प्रोफेसर बनने का मार्ग खोल देगा,,,,, take इट इजी,,,,!"
ओके,,,, अंधेरा,,,, चीख,,,,,,समाप्त।

रविवार, 30 जुलाई 2017

प्रश्न पत्र

एक बडी परीक्षा का प्रश्नपत्र बनाने की कार्यशाला थी।
मैं भी गया था।
हालांकि यह काफी गोपनीय और जिम्मेदारी का कार्य है और उसे सार्वजनिक नहीँ किया जा सकता।
कार्यशाला के संयोजक की बहुत सारी विशेषताएं थीं।
वे मंत्रीजी के खास थे। एक बड़े नेता के कुटुंब से भी थे। स्थापित बुद्धिजीवी, लेखक प्रोफेसर, शिक्षाविद वगैर वगैर तो थे ही,,,, कठोर अनुशासन के लिए भी प्रसिद्ध थे, सत्तापक्ष के चहेते भी थे!!
ज्यादातर सम्भागी भी नये थे। नई सत्ता के अनुरूप "कुछ कर गुजरने"की उमंग और आशा से भरे हुए।

"उन्होंने जैसी मनमानी की वैसी तो नहीं करेंगे पर जो #कानूनन सही है और सत्य है वह तो कर ही सकते हैं।"   इस आशय की बातचीत हो रही थी।

कुछ प्रोफेशनल और #अनुभवी बुजुर्गों के चेहरे बता रहे थे कि वे रीत का रायता निपटाने आए हैं और जरूरत पड़ी तो विरोध भी करेंगे!!

एक प्रभाग का प्रभारी मुझे बनाया गया। दिन भर अपनी कमेटी के मेम्बर्स को समझने और समझाने में बीता!!

सभी जन इस बात पर सहमत थे कि हम ऐसा कुछ करें कि काम की प्रशंसा भी हो और हमें इस तरह बार बार बुलाया भी जाता रहे!!

मैंने उनकी समीक्षा बुद्धि की टोह ली। कुछ ट्रिक समझाए कि एक ही टॉपिक पर वामपंथियों और हमारे द्वारा बनाए प्रश्नों में किस प्रकार की भिन्नता होगी।

हमें उद्देश्यों की पूर्ति करने के साथ साथ यह भी ध्यान रखना है कि हम ऐसा पेपर सेट करें कि कम्पीटिशन में वामपंथी साहित्य को छात्र कम से कम पढें।

हमारे प्रश्नों की धार ऐसी हो कि विवश होकर प्रतियोगी वही पढें जो हम पढ़ाना चाहते हैं,,,, बिलकुल वास्तविक और भारतीयता के अनुकूल।

हमारे पेपर बनाने भर की देर है। बाद में प्रश्नों का #जायका समझकर ही सारे कोचिंग संस्थान, क्रोनोलॉजी, कम्पीटिशन साहित्य आदि अपनी दिशा बदल देंगे।

हमें अपनी तरफ से नया कुछ भी नहीं थोपना है, मौजूदा सिलेबस में ही वे सारे तत्व, तथ्य और परिभाषाएं विद्यमान है जिन्हें हम उभारना चाहते हैं। अभी इतना जिंदा तो है ही भारत!!

बस जरूरत है हमारे दृष्टिकोण की,,,, और #उनके छल,छद्म, टोटकों के पहचान की!!
इसके लिए हमें कॉपी पेस्ट से बचना होगा, परिश्रम करना होगा। अपने #ट्रिक्स एक दूसरे से साझा करने होंगे और तथ्यों को गहराई से समझने की दिशा में और आगे बढ़ना होगा।

ऐसा करके हम न केवल भारतीय मेधा का रुख मोड़ सकते हैं, बल्कि उन सभी देशद्रोही, jnu छाप लाल लँगूरों के मुँह पर तमाचा मार सकते हैं जो अपनी विकृत मानसिकता को देश की नौकरशाही में रोप कर खूब बड़ी गिरोहबंदी में लीन हैं।

पर सावधान,,,,, बहुत सूक्ष्मता से,,, बहुत ही महीन कारीगरी से,,,,, एक एक बात सोच समझकर,,,,, उनसे भी बड़ी समझ और रणनीति से हमें यह सब करना है, जिससे कल को कोई कोर्ट कचहरी या मिडियाबाजी का #झंझट नहीं रहे!!

हमारी योजना इतनी ठोस और निरापद थी कि इस कल्पना से ही हम रोमांचित हो गये।

हममें सपने सच करने की उमंग और उत्साह ऐसा था कि हमने आस पास वाले दूसरे ग्रुप्स में भी यह चर्चा चलाई। जिस जिस को यह समझ आया वह पूर्णतः हमसे सहमत था।
दो दिन इसमें बीत गए, तीसरे दिन कार्य आरम्भ करना था। इन दो दिन-रात्रियों में हमने पूरी लायब्रेरी छान डाली। नोट्स और सन्दर्भ से डायरियां भर गईं। पन्ने पर पन्ने लिखे जाने लगे। परस्पर सलाह कर प्रश्न की धार की तीक्ष्णता और दिशा के सारे जोड़ घटा माप लिए।
हर वह प्रश्न जो वामपंथी-विकृत सोच के निहित स्वार्थों का पोषक था, हमने चीर फाड़ कर उसकी चिन्दी चिन्दी की और उसी सामग्री से एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया।
जैसे,,,,
प्रश्न यदि वनवासियों के असंतोष का था तो हमने उसे उनकी प्रकृति पूजा की परम्परा में बदल दिया।
प्रश्न यदि हिंदी गद्य में उर्दू के योगदान का था तो हमने अदालती शब्दों में उर्दू के दुराग्रह के आंदोलन की बात छेड़ी।
प्रश्न यदि पंचशील के सिद्धांत का था तो हमने वहाँ चीन के विस्तारवाद को पूछा।
हम अब सिद्धहस्त हो चुके थे।
वामपंथ का एक किला जड़ से ढहने वाला था।
हमने अपनी कार्ययोजना और रूपरेखा "संयोजकमहोदय" को समझाई और उनसे हरी झंडी चाही।

प्रश्न पढ़ते ही वे #फक्क से अरुचि से भर उठे।
"इतनी जल्दी नहीं,,,,!" वे असहाय से घबराने लगे।
मैं उन्हें समझाने लगा कि "सर कुछ नहीं होगा,,,,!"
पर वे अत्यंत आतंकित दिखने लगे।
हवा का रुख देख कुछ बुजुर्ग भी आगे आये। वे आश्वस्त करने लगे कि बहुत पक्का काम हुआ है। जो वास्तविकता है, वैसा हुआ है और नये सदस्यों ने बहुत परिश्रम करके असत के विरुद्ध पहली बार कोई स्थाई कार्य किया है। कोर्ट इत्यादि के झंझट का सवाल ही नहीं!!
पर वे क्रमशः कठोर होते गए। रिस्क शब्द उनकी डिक्शनरी में ही नहीं था।
जो चल रहा है, चलने दो!!
मैं,,,,, जो अब तक उन्हें बहुत जिम्मेदार, ज्ञानी, कूटनीतिज्ञ और न जाने क्या क्या समझ रहा था,,,, कुछ क्षण के लिए सदमे में आ गया।
समझ गया कि यह लड़ाई इतनी #सरल नहीँ!!
फिर से कुंआ खोदूँगा।
ताजा पानी पीऊंगा।।
#kss

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

किताब

तो ये कुछ यूँ हुआ।
मैडम ने एक किताब लिखी।
#मुनमुन भाषा में। इधर का यही रिवाज है। जो भाषा आती नहीं, उसी की किताब बेस्ट मानी जाती है।
तुरन्त दैनिक #चुनचुन अखबार में समीक्षा छपी।
कोई दूर देश में हर साल #डबडब नामक पुरस्कार दिया जाता था। बड़ी चर्चा होती थी उसकी भी।
कोई कोई इसे साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार भी बताते थे।
मैडम ने अप्लाय किया और मिल भी गया।
बात तुरन्त फैली। जनरल नॉलेज क्रॉनिकल में आई।
इस बार सभी अखबारों ने इस पर सम्पादकीय लिखे।
चुनचुन अखबार ने इंटरव्यू भी छापा।
देश का सबसे पहला पुरस्कार जीतने वाली साहित्यकारा,,, ब्ला ब्ला ब्ला,,,।
किताब के अनुवाद पर बजट जारी होने लगे।
यूनिवर्सिटी में सेमिनार।
पीएचडी और थीसिस।
इतर भाषाओं वाले कुंठित लेखक हाथ मलते रहे।
उन्हें अपना भविष्य मैडम के पैरों के बीच में से जाता हुआ दिखा।
मैडम अब सलाह देने लगी।
यूँ लिखो,,, ऐसा न करो वगैरह वगेरह।
कुछ समय बाद फिर एक किताब आई।
फिर पुरस्कार। फिर जी.के.।फिर इंटरव्यू।
फिर किताब,,,, चक्र घूमता रहा।
"महान्" लेखिका का कद बढ़ता गया।
उसकी काली छाया तले सब कुछ अँधेरे में डूबता गया।
एक आभासी समर्थक वर्ग खड़ा किया गया।
वे मालामाल हो गई ।
विदेश यात्रा, सेमिनार, इंटरव्यू से फुर्सत ही नहीं मिली।
बुढ़ापे में भी सक्रियता।
चेले किताबें तैयार करते, वे अपने नाम से छपवाती । बड़े बड़े सम्पर्क। अभिजात्य ठसक। बड़ी बिंदी। हर समय अपने देश संस्कृति को गरियाती। नसीहतें देतीं। उनके #निहितार्थ ढूंढने को एक पूरी फौज खड़ी थी।
अब तो वह विशेषज्ञ बन गई ।
हर मामले में उसकी राय जानने को लोग दौड़ पड़ते। वह धिक्कारती, पुचकारती, दहाड़ती, चिंघाड़ती, हिंहिनाती, चहल पहल, दबादब लगी रहती। कमसिन चेलियों का हुजूम।ओवरस्मार्ट चेले, बातूनी समीक्षक, महफिल में कहकहे,,,, यही सब कुछ चलता रहा, वर्षों तक।
एक युवा छात्र ने उस पर #आरम्भ से ही शोध करना चाहा।
बात मुनमुन भाषा पर अटक गई।
ये कौनसी भाषा है?
बहुत खोज की।जवाब न मिला।
इस नाम की कोई भाषा न मिली।
जहाँ से जवाब आना था, उन्होंने धक्के दे कर बाहर निकाल दिया।
गुमसुम लड़का, किले से नीचे उतरने लगा।
मन बहलाव के लिए कठपुतली वाले से बात करने लगा।
अचानक गुत्थी सुलझ गई।
मुनमुन भाषा तो कठपुतलियों की भाषा है!!!
#kss

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

थूक

और एक दिन बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया!!!
सफाई कर रही थी।मुंह में सुपारी थी।पीक आया तो वेदी में।
पर उसे आश्चर्य हुआ कि उतना थूक स्वर्ण में बदल गया है।
अब तो वह प्रतिदिन जानबूझकर वेदी में थूकने लगी।
और उसके पास धीरे धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा।
महिलाओं में बात तेजी से फैलती है।
कई और महिलाएं भी अपने अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक थूक कर सोना उत्पादन करने लगी।
धीरे धीरे पुरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया।
सिवाय एक महिला के....!
.
उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया..!
समझाया..!
"अरी...तू क्यों नहीँ थूकती?"
.
"जी...!  बात यह है कि मै अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हरगिज नहीँ करूंगी। और वे .... जहाँ तक मुझे ज्ञात है.... अनुमति नहीँ देंगे!"
किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया.... कि आखिर उसने एक रात डरते डरते अपने #पति को पूछ ही लिया।
"खबरदार जो ऐसा किया तो.....!!  यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है??"
पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस.... वह महिला चुप हो गई।

पर जैसा वातावरण था...और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी।

खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी।

पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते।

"यह शायद मेरा दुर्भाग्य है..... अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप....कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है।"

"शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है।"

"ओह... इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है?"

"जिस नियम के पालन से #दिल कष्ट पाता रहे... उसका पालन क्यों करूँ?"

और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी।
#पतिदेव इस रोग को ताड़ गए।
उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया।
गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए।

सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।

किन्तु.......
अरे.....यह क्या..?????
.

ज्यों ही वे गांव की कांकड़(सीमा) से बाहर निकले...
पीछे भयानक विस्फोट हुआ।
पूरा गांव धू धू कर जल रहा था।

सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए।
और उस स्त्री को अपने पतिका महत्त्व समझ आ गया।
वास्तव में....इतने दिन गांव बचा रहा...
तो केवल इस कारण....उसका परिवार गांव की परिधि में था।
हे... भारत!!
यद्यपि यहाँ थूकने वाले फलफूल रहे है।
पर
तू जाने न देना....
उस साध्वी को।
वरना........
वाकई #गजब हो जाएगा।
#kss

सोमवार, 20 जुलाई 2015

लवस्टोरी

एक नामी होटल का रूम बॉय, ट्रैन से अपने घर को जा रहा था। कुछ तेज तो था ही, अभिजात्य वर्ग की निकटता से कई टोटके भी सीख गया था। लम्बा और उबाऊ सफर कैसे कटे इसका उपक्रम कर रहा था।
उसी कम्पार्ट में एक कॉलेज की महिला प्रोफेसर भी सफर कर रही थी।किसी दूरस्थ एकाकी कोने में नियुक्त होने से हर समय दूसरों से तुलना करने वाली और अपनी प्रतिभा का उपयोग न होने से असन्तुष्ट।
लड़के ने अपनी अभिजात्य व्यवहार की समस्त प्रतिभा का उपयोग करते हुए आखिर मेम को बातचीत के लिए मना ही लिया।और बातचीत की गाड़ी ज्यों ही सेकण्ड गियर में आई, खुद का परिचय एक बड़े लेखक के रूप में दिया।
बस फिर क्या था....गाड़ी सीधे टॉप गियर में आ गई। अविश्वास का कोई कारण नहीँ था क्यों कि छोरा कई सनकी लेखकों की बड़ी सूक्ष्म परिचर्या कर चुका था और एक्टिंग में नम्बर वन था।
दो घण्टे मजे में बीत गए और जब कुछ जलपान की स्थिति बनी तो दोनों ही हिचक गए।  थोड़ी सी बहानेबाजी कर इधर उधर हो लिए।
खा पीकर वापस बैठे तब दोनों ही कुछ उधेड़बुन में व्यस्त थे।पहले लड़के वाली कल्पना सुनिए
बात जान पहचान, प्यार, शादी और बच्चों की संख्या तक पहुंच गईं थी पर जब नींव की कमजोरी का भान हुआ तो वह ठिठक गया। कल्पना के घोड़े को लगाम दे, बीच में उस सीन को फिट करने की कोशिश में लग गया जब मेम को "सब कुछ सच" बताकर भला मानुस बनेगा और पछतावे के आंसू बहायेगा।
अभी...? अरे नहीँ! अभी तो काफी टाइम पास करना है। एक सप्ताह बाद?  या फिर एक माह या फिर जब तक जैसे चले वैसे ही...?
ओह....अब मै क्या करूँ? मुझे शुरू में ही सच बोलना था।.....वगैरह2
उधर मेम की कल्पना बड़ी सपाट थी।
एक किताब लिखना।छपवाना। विमोचन। भूमिका में ही लेखक महोदय का आभार जताएगी। साथी प्रोफेसरों में मान बढ़ेगा। लड़कियों को भी पता चलेगा मै क्या हूँ....!  और एक तुम लोग हो कि कुछ सीखना ही नहीँ चाहती....! ढीठ कहीँ की...सबकी सब...अरे यही तो उम्र है टेलेंट पहचानो...देखो कि तुम्हें किसका सानिध्य मिल रहा है?
पहचान बढ़ेगी तो काम भी आएगा।
मै तो फ़िल्म स्टोरी लिखूँगी।
लिखूंगी....क्या..जो लिखी हुई पड़ी है वो सब बिक जाएगी। वो...#चिंचणी वाली स्टोरी...! क्या गजब कथानक है? जो भी निर्माता लेगा मालामाल होगा। जयप्रकाश की समीक्षा छपेगी.... प्रोड्यूसर पूछेगा "मेम! धारवी का रोल किसको दूँ...?"
धारवी का रोल जो भी करेगी...सुपर डुपर स्टार होगी। हो सकता है सम्वाद भी मै ही लिखूँ.....! डबल ट्रिपल कमाई। पति पूछेगा.....अरे....तो इनके पति देव भी है।
बेचारा लेखक?
गाड़ी अब उस गुफा में प्रवेश कर गई है जहाँ आगे the end आ गया है और मुड़ने की जगह नहीँ।
रिवर्स गियर....लगाओ।
लव स्टोरी समाप्त।
यात्रा भी समाप्त।
#kss

रविवार, 5 जुलाई 2015

वृद्ध

"जब तक यह दिव्य पुरुष जिन्दा है....अश्वत्थ वृक्ष हरा रहेगा। झरना बहता रहेगा। वर्षा होती रहेगी.......!"
इस आकाशवाणी को सुनकर  श्री "र" नाम के व्यक्ति ने सोचा.....ओह! यद्यपि समय कम है और दिव्य पुरुष मृत प्राय है, तथापि इसे बचाने के प्रयत्न करने चाहिए।
श्री "र" लग गए।अपनी समस्त शक्ति के साथ। रात-दिन एक करके, भूख प्यास पर विजय पाकर, सुख निद्रा को तिलांजलि दे, परिवार की अवहेलना कर, शीत-ग्रीष्म की गणना से विरक्त, समस्त सुविधाओं से परांमुख हो, दूसरों के उपहास सहन कर, सज्जनों की निष्क्रियता से आहत हुए बिना, विरोधियों के व्यंग्य प्रहार से विचलित न होते हुए......सचमुच....ब्रह्मा के सृष्टि निर्माण पश्चात् यह अद्भुत परिश्रम का अनुष्ठान...प्रथम बार हो रहा था।
और चार पांच गिद्ध, उनमने से अश्वत्थ की डाली पर बैठे दिव्य पुरुष की अंतड़ियोँ का इंतजार कर रहे थे।
झरने की पहाड़ी के शिखर पर कुछ भेड़ियों की आँखों में चमक थी।
बिलों में बैठे नाग अपने विषदंत तीखे कर रहे थे।
यहाँ तक कि मृत भक्षी रेंगने वाले कीडों को भी दिव्य पुरुष से "आशा" थी।
और तो और......
श्री "र" की परिचर्या से कुछ कुछ स्पंदित होते और चेतन होते, दिव्य पुरुष के अंग भी इस गुमान में थे कि यह चेतना मेरी कोशिश का परिणाम है।
हाथ का दावा था कि समस्त उत्थान का भूत भविष्य मेरा है तो सिर कुछ और ही सेटिंग में व्यस्त था।
पेट ने खराब होने का ढोँग रच रखा था तो पैर अपने को जननेन्द्रिय वाली जगह फिट करने की जुगत में लगे थे।
बड़ी अजीब सी स्थिति।
कमजोर परिवार की कलह के समान सारे अंग, एक दूसरे को ही ऊँचा नीचा बताने की जुगत में थे।
यह देखकर  "गिद्ध से कीड़ों" पर्यन्त समस्त वर्ग को ख़ुशी हुई।
श्री "र" फिर भी लगे है। अचेतावस्था के बहाने कभी हाथ का झापड़, तो कभी पैर की लात भी लगती। नाक से झरता कफ श्लेष्मा भी साफ करना पड़ता तो हर घण्टे डायपर बदलना पड़ता।
कभी मालिश हो रही है तो कभी केश संवारे जा रहे है।
और....श्री "र" की हालत.....? निद्रा, अपमान,थकान, पीड़ा, घात,आघात, सहित इस घोर कर्म से जब थकते तो एक क्षण को ऊपर की ओर ताकते.....!
डाल पर बैठा गिद्ध संकेत करता...."क्यों फालतू मथाफोड़ी कर रहे हो? आखिर तो मुझे ही देना पड़ेगा।"
#kss (6-7-15)

सोमवार, 8 जून 2015

राजपूत

1977-78 के वर्ष भयंकर अकाल पड़ा...मरुभूमि में।
चनण सिंह के कुल 250 गायें थीं।
आवतु सुथार की 40, कुम्हार की 10, नाई की 20, महाराज(पालीवाल जी) की 150 गायें, सोढा परिवार की 500 और चैन सिंह की 100थी।
कार्तिक आते आते घास खत्म....कुत्ते कुकाट करते और रिवड़ी की तीनों तलैयाँ सूख चुकी थी।
माताजी के सारे गहने...सोना चाँदी आदि बिक चुके थे।और....तय हुआ कि गायों को यहाँ से 300किमी दूर हाकड़ा तले(कुए) पर ले जायेंगे।
हाकड़ा तलासूना था....1965 के युद्ध में उसके मालिक उनड़ मुसलमान सिंध भाग चुके थे।सूखी सेवण घास बहुत थी और पानी कुछ कुछ खारा था।
दो गधे...तीन ऊंट....और 5 पुरुष....पांच पुरुषों में भी चैनसिंह तो 15वर्ष का लड़का ही था...एक हजार से ज्यादा गायें लेकर हकड़ा पहुँचे। एकदम पाक बोर्डर पर।
रायधरों का गवाड़ पहले ही वहाँ पहुंच चुका था। हजारेक गायें उनकी थी।
सूना कुंआ आबाद हो गया....!एक दिन छोड़ के एक दिन के अंतराल से अपने गवाड़ का नम्बर आता।ऊँटों से पानी निकाला जाता।60पुरुष(160फीट)गहरे कुंए से 2बजते बजते सारी गायें पानी पी चुकी होती।
बाद में रोटियां बनती....खेजड़ी के नीचे... बड़ी कठोर दिनचर्या थी...!कुछ कुछ गायों ने ब्याना शुरू किया...दूध में रोटी और बछडों के लिए पखाल में पानी....चैत्र के बाद गर्मी बढ़ी...पानी के चड़स ज्यादा निकालने होते...ज्यादा दबाव सहन नहीँ कर सकने से एक ऊंट मर गया।
तुरन्त सबके कानों के गोखरू(एक गहना) इकट्ठे कर साढ़े सात तोले सोने के बदले....रामगढ़ से दूसरा ऊंट खरीदा गया।
#kss
आषाढ़ आते आते बादल आने लगे।कहीँ कहीँ बरसात होने के समाचार आने लगे।.....लगभग आधी गायें मर चुकी थी।
कमोबेश सारे #खडाल की यही स्थिति थी। रामगढ़ के वैश्य वर्ग ने कई मण सोना चाँदी जुटा लिया था...और अब मद्रास जाने की तैयारी में थे।(बाद में वे वहाँ गए और बड़े मारवाड़ी सेठ बन गए।)
आधे आषाढ़ की किसी अँधेरी रात में चमकती बिजली से अंदाजा किया गया कि यह बरसात रिवड़ी पर हो रही है। तैयारियां की गई....गायों के कान में कहा गया "हल भटारि अपणे देश....!"
गायें सुबह होते होते तैयार थी....पूरे गवाड़में घर जाने का उत्साह...दिन भर चलते रहे।
शाम को सतारवाली पर डेरा दिया।गायों ने पालर पाणी पिया।गधों से भार उतारा।
रोटी बनाने का समय नहीँ था।
तपेली में दूध गर्म कर पी रहे थे।
अमावस की उमस भरी रात थी। अँधेरा.....उमस....भयंकर गर्मी...बिजलियों की चमक के बीच....चनण सिंह के पेट में दर्द उठा और क्षण भर में तड़पते हुए प्राण त्याग कर गए।
कई दिन से पीलिया बुखार था...उमस और गर्म दूध ने जहर का काम किया....सब कुछ खत्म।
चैन सिंह की रुलाई सुन कर गायें डहाकने लगी।रात भर कोहराम मचा रहा। सबसे ज्यादा सदमे में गायें और ऊँट थे।खाना पीना छोड़ दिया।सब कुछ अस्तव्यस्त हो गया।एक एक कर सारे पशु धड़ा धड़ प्राण देते जा रहे थे....मानो प्रिय स्वामी के पथ का अनुसरण करना इनके लिए भी जरूरी हो!!
इधर ......आँगन में लाश आई और उसी समय चनण सिंह की पत्नी को प्रसव हुआ।.....ऊंट....गायें...कुछ न बचा।
और उधर......दिल्ली यूनिवर्सिटी के वामपंथी अपने सेमिनारों में जी भर कर सामन्तों को गालियां दे रहे थे।
एक इंच भी जमीन न होते हुए भी...चनण सिंह सामन्त था।उसको उखाड़ फैंकने की अपीलें हो रही थी। आग उगलती किताबें छप रही थी।पाठ्यक्रम में जनवादी लेखन के बहाने., चनण सिंह को जड़ मूल से उखाड़ने की प्रतिज्ञा करते वृतांत परोसे जा रहे थे।
प्रगतिशील कवियों की मानें तो चनण का अभी अभी जन्मा शिशु.#.   #एक_सपोला है जो क्रांति की चिंगारी लाने में सहायक है।
सुथार, नाई और महाराज ने अपनी अपनी बची गायें सम्भाली।
सामने बुनकरों के मुहल्ले में सर्वोदयी सत्संग चलता और इधर एक #सामन्त अपनी माँ के सूखे हृदय में दूध खोजता बिलबिलाता।
#kss

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

दिल में छेद

विनोद जैसे नितान्त लापरवाह और प्रतिगामी के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था।
शादी के दूसरे ही वर्ष पुत्र हुआ और छठे ही महीने बीमार भी।शहर के हॉस्पिटल ने यहां महानगर के एक नामी सरकारी हॉस्पिटल को केश रैफर किया है।दोपहर तक वी सेट लग गया।जाँच के समय जब खून निकाला जा रहा था तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।
पुत्र के इलाज में उसे स्वयम् नहीँ आना था।
आज पहली बार उसे लगा कि वह कितना कच्चे दिल का है।
खेर ,,,,,,अब बच्चे ने रोना बन्द कर दिया था।पत्नी को बेड के पास वार्ड में ही छोड़ वह बच्चे को उठाकर इधर उधर घूमने लगा।
घूमते घूमते वह नीचे आउटडोर में आ गया।बड़े से कक्ष में काफी भीड़ और चिल्ल पों मची थी।
दो तीन जूनियर डॉक्टर गले में ss लटकाए मरीजों को जाँच रहे थे।
अभी ये डॉक्टर कम और ट्रैफिक पुलिस के सिपाही ज्यादा लग रहे थे।.....बेहद चिड़चिड़े,,,,,और मरीजों के परिजन कोई अपराधी की तरह उनकी बातें सुन रहे थे।
विनोद की दृष्टी कोने में बैंच पर बैठी एक महिला पर जा पड़ी।.....शायद कहीँ देखा है.....साँवली सी....पतली से,,,,,दिखने में तमिल लगती है।
अरे हाँ,,,,,अपने शहर में व्यासजी की प्रोल पर इडली बेचने वाले की बीवी है।वही जिसको जब भी देखता, प्रभुदेवा याद आता था।यह उसी की पत्नी है।पास में जो बैठी है वह कोई उत्तर भारतीय पड़ोसन है।
तमिल महिला की गोद में भी एक बच्चा है।
अपने मोंटू जितना ही......6माह का।
"56 नम्बर.......!"
डॉक्टर की तेज आवाज गूंजी।
साथ वाली महिला ने तमिल महिला को इशारा किया।वह झट से खड़ी हो गई।
दोनों डॉक्टर की ओर बढ़ी।बच्चा पड़ोसन ने अपनी गोद में ले लिया।
अब बच्चा धीरे धीरे रोने लगा।
"प्रभुदेवा" को वह भी जानता है।काफी वर्ष हो गए शादी किये।कोई दसेक वर्ष बाद हुआ है बच्चा।
वो तो तमिल महिला के चेहरे से ही लग रहा था कि बच्चा उसे कितना प्रिय है।जब वह उसे पड़ोसन को सम्भला रही थी तब ऐसा लग रहा था जैसे तीसरी का कोई बच्चा अपनी ज्यामेट्रि सहपाठी को सौंप रहा हो......कि अभी ज्यों ही वापस माँगूँ,तुरन्त लौटानी होगी।
बच्चे के रोने के साथ ही साथ माँ भी उचक उचक कर हिचकी ले रही थी।मानो रुदन इसके अंतर्मन में है और बच्चा केवल स्पीकर है।
"जल्दी,,,,जल्दी,,,!"
डॉक्टर की इस धमकाने वाली आवाज के साथ ही दोनों ने अपनी गति बढ़ा दी।
जाँच चालू हुई।
विनोद भी जिज्ञासावश सरक कर पास में खड़ा हो गया।
बच्चे को टेबल पर लिटाया गया।
अब बच्चा जोर जोर से रोने लगा।
विनोद ने देखा।बच्चा क्या था, एक एक पसली सामने दिख रही थी।
डॉक्टर ने कमीज ऊपर सरकाया।
बिलकुल कमजोर।किताबों में भ्रूण के चित्र जैसा।
मानो कुछ अंतड़ियाँ और अंग किसी पीले प्लास्टिक में डाल कर रखे हों।
डॉक्टर अपने कठोर हाथ से उसे दबाए हुए कुछ पूर्व निश्चित प्रश्न पूछे जा रहा था।
माँ को तो हिंदी आती नहीँ।
पड़ोसन उत्तर दिए जा रही थी।
।लेकिन डॉक्टर न तो ऊपर देख रहा था और न ही उसे उन जवाबों से कोई मतलब था।वह तो पूछे जा रहा था।उत्तर समाप्ति से पूर्व ही दूसरा प्रश्न,,,,,,फिर प्रश्न......कर्कश और ऊँचे स्वर में.....दृष्टि बच्चे के पेट पर......विनोद को याद आया , वह कॉलेज में रैंगिंग के समय इस स्टाइल से प्रश्न पूछा करता था;नए लड़कों को।
बच्चे ने रोना बन्द किया।
माँ उसे निहारे जा रही थी।मुग्ध भाव से।
पीठ के बल लेटा बच्चा जो जो हरकत कर रहा था उसका स्पंदन इस माँ के चेहरे पर साफ पढ़ा जा रहा था। विनोद ने कनखियों से देखा, माँ बहुत प्रगल्भ भाव से बच्चे को निहारे जा रही थी।एक तृप्ति थी उसके चेहरे पर......माँ बनने की......मानो वहाँ मौजूद अन्य माँओं को कह रही है.....देखो मेरे भी बच्चा है।मैं भी माँ हूँ।
..........
अचानक डॉक्टर ने बच्चे को कठोर उँगलियों से जोर से दबाया.....बच्चे के चीख निकल गई,,,,,और माँ के भी। शायद जाँच के लिए बच्चे को एक बार और रुलाना आवशयक था।
"अरे .... पकड़ के रखो न इसे!!"
डॉक्टर चिल्लाया।
पड़ोसन ने उसे आहिस्ता से पकड़ा।पर बच्चे ने स्टेथोस्कोप की नली ही पकड़ ली।
पकड़ मजबूत थी।डॉक्टर ऊपर को हुआ......नली तो नहीँ छूटी....झटका डॉक्टर के कानों को लगा!!
डॉक्टर गुस्से से काम्पने लगा।
झल्लाकर फिर कोशिश की तो बच्चा खिलखिलाने लगा।
बच्चे की मुस्कान के साथ ही माँ की जान में जान आई। एक विशेष प्रकार के आनन्द के फोटोन फूट फूट कर बाहर आते देखे जा सकते थे।
"अरे....ऐसे पकड़ते हैं क्या?,,,,ठीक से पकड़ो.......साथ में कौन है?"
डॉक्टर इतनी जोर से चीखा कि पूरा आउटडोर हॉल में भयानक सन्नाटा छा गया।
अगले ही पल पूरा हॉल दर्द भरे क्रंदन से गूंजने लगा।
डॉक्टर ने दोनों हाथों से उसे झिंझोड़ते हुए उल्टा पटक दिया।कच्चे कच्चे हाथ और पैरों को दोनों औरतो ने पकड़ रखा था।
पीठ पर फिरता स्टेथोस्कोप और डॉक्टर के पंजे में जकड़ा बालक.......ऐसा लग रहा था मानो कोई प्यारा सा पक्षी किसी विशाल अजगर के जबड़ों में फ़ड़फ़ड़ा रहा हो।
विनोद भीतर तक हिल गया।
जाँच पूरी हुई।
माँ ने अपनी "प्यारी ज्योमेट्री" सीधे ही उठा कर छाती से चिपका ली थी।
पड़ोसन ने डरते हुए पूछा "क्या बीमारी है?"
डॉक्टर ने ss उतारकर ऊपर देखे बिना सहज  भाव से कहा "दिल में छेद है।"
तमिल महिला तो हिंदी जानती नहीँ थी।उसे तो अपना बच्चा मिल गया था।वह उसे छाती से लगाए कृतज्ञ भाव से डॉक्टर को देखे जा रही थी।
बच्चे को मन ही मन सांत्वना दिए जा रही थी.......मेरे लाल!....जितनी तकलीफ भुगतनी थी भुगत चुका तू.......अब बस डॉक्टर साहब दवाई लिखें और सब कुछ ठीक.....!
पर पड़ोसन समझ गई कि इस एक वाक्य का क्या अर्थ है.......दिल में छेद.......!
"क्या ss?"उसने फिर से पूछा।मानो अपराध कर रही है।
"दिल में छेद है।तीन माह में ऑपरेशन न किया तो खतम।""
विनोद को आश्चर्य हुआ कि स्टेथोस्कोप से भी दिल के छेद का पता चल सकता है।
उसने खुद के बच्चे को बहुत जोर से भींच लिया।
तमिल महिला अभी भी मुग्ध भाव से संकट टल जाने की ख़ुशी मना रही थी।
#kss
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