शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

सेवा धर्मो परम् गहनो.....

कुछ यादें ऐसी भी
जब पहली पोस्टिंग हुई तब काफी दूर और नए लगने वाले स्थान पर लगाया गया था।

वहाँ बकरी पालन मुख्य व्यवसाय होता था। जरा जरा सी बात पर बकरा काटा जाता था। खूब प्रचलन था। उनके लिए मांसाहार आलू शब्जी से भी सस्ता था। हालाँकि मै मांसाहार नहीँ करता था पर घुलने मिलने के लिए हर उत्सव में शामिल होता था।
शादी ब्याव में खास कर बाहर से आने वाले मेहमानों का अध्ययन करने पर पता चला..... बाहरी लोग मांसाहार के लिए मरे मरे जाते थे।
यूँ भी दारू मांस और बीयर कितना भी लाओ, शॉर्टेज बनी ही रहती है।
पता नहीँ क्या रखा है इस हड्डी वाले भोजन में, कितना भी परोसो, थाली भरी पड़ी हो तो भी खाने वाले का मन नहीँ भरता।
परोसने वाले को बड़ी हसरत भरी नजर से देखा जाता है....!!
एक और बात नोट की कि अधिक दारू और माँस सेवी वाले लोग स्वभाव से आलसी, कायर, कामोपभोग के इच्छुक और शेखी बघारने वाले थे।
आजकल तो सम्पर्क में नहीँ हूँ, पर उन दिनों इसका सेवन करने वाले ज्यादातर लोग केवल इसलिए ज्यादा खाते थे कि इसके सेवन से #वो पावर बढ़े। अपनी भी शोध दृष्टि रही है। कुछ पीछा करने पर पता चला कि इनका पारिवारिक जीवन सन्तुलित तो कत्तई नहीँ।
साहब कहीँ और मुँह मारते है तो मैडम कहीँ ओर...!
फिर कुंआरे और बच्चे भी मरे जाते थे.....खैर...आसुरी आहार है ही ऐसा।
दूसरी याद अफीम के बारे में है। उधर खूब प्रचलन था। मिलिट्री एरिया था।  कई फौजी भी छुट्टी जाते समय थोड़ा अफीम घर ले जाने की डिमांड करते रहते थे। थोड़ा बहुत ले भी जाते थे।
अफीम की लत वाले लोग लाख तर्क दें......इनका भी मामला उस टाइप का ही रहा होगा।
स्कूल में दो तीन टीचर sc वर्ग के थे। वे अपना पीना पिलाना स्कूल में ही निपटाते।
उन दिनों जब 31मार्च को दारू ठेके बन्द होने वाले होते और शराब सस्ती होती थी तो मुझे याद है उन्होंने अपनी सेलेरी से खरीदकर एक कमरा ही भर दिया था दारू के कार्टन से।
ये बन्धु कहीँ बाहर से अप डाउन करते थे। मै वहीँ क्वार्टर में रहता था। एक बार एक टीचर ने अपने घर पर इतनी ज्यादा पी ली कि देहरी लांघते समय गिर गया और  दोनों पैरों की  हड्डियां टूट गई। एक महीने cl pl और ml से चला फिर तय हुआ कि वे मेरे पास क्वार्टर में रहेंगे।
मै भी आदत से मजबूर, उनकी बहुत सेवा करता था। सबसे कठिन मामला था उनका टॉयलेट जाना। उसके लिए एक कुर्सी में छेद करके शौचालय में फिट किया गया।
वे शौच जाकर बाहर आते तब मै उन्हें बैशाखी पकड़ाता। फिर पानी आदि डालने का स्वच्छता कार्य मुझे ही करना पड़ता। बाल्टी भरना, स्नान कराना आदि सभी कार्य बहुत श्रद्धा भाव से करता क्यों कि वे मुझसे सीनियर थे।
पर कुछ दिन बाद मैने नोट किया कि शौचालय में गन्दगी का बिखराव ज्यादा ज्यादा होने लगा।
हालाँकि अपुन गांधी बा को पढ़े थे और निर्लिप्त निर्विकार भाव से सेवा कर दिया करते। फिर तो बिखराव दिनों दिन बढ़ता गया।
एक बार वे छुट्टी में घर गए। वहाँ वैसी सेवा नहीँ होने पर उन्होंने अपने जवान लड़के की कलाई पर बैशाखी दे मारी और उसका हाथ फैक्चर हो गया।
लंगड़ी हालत में भी वे महफ़िल सजाना नहीँ भूले। क्वार्टर पर ही दो तीन मिलकर पार्टी मनाने लगे।
एक बार पीकर टुन्न होने के बाद उन्होंने अपने साथियों पर एक रहस्य खोला।
"ये लड़का मेरी खूब सेवा करता है। टॉयलेट साफ करता है। अब राजपूत कोई और मेरा टॉयलेट साफ करे इससे ज्यादा मजा क्या आता होगा? मेरा तो जीवन ही सफल हो गया। आजकल मै जान बूझकर कुर्सी से हिल डुल कर ज्यादा गन्दगी बिखेरता हूँ, ताकि ज्यादा मजा आ सके।"
बात मैने सुन ली।
सेवा करने का मेरा नशा उतर गया। और उसका तो खैर उतरना ही था।
#kss

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

थूक

और एक दिन बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया!!!
सफाई कर रही थी।मुंह में सुपारी थी।पीक आया तो वेदी में।
पर उसे आश्चर्य हुआ कि उतना थूक स्वर्ण में बदल गया है।
अब तो वह प्रतिदिन जानबूझकर वेदी में थूकने लगी।
और उसके पास धीरे धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा।
महिलाओं में बात तेजी से फैलती है।
कई और महिलाएं भी अपने अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक थूक कर सोना उत्पादन करने लगी।
धीरे धीरे पुरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया।
सिवाय एक महिला के....!
.
उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया..!
समझाया..!
"अरी...तू क्यों नहीँ थूकती?"
.
"जी...!  बात यह है कि मै अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हरगिज नहीँ करूंगी। और वे .... जहाँ तक मुझे ज्ञात है.... अनुमति नहीँ देंगे!"
किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया.... कि आखिर उसने एक रात डरते डरते अपने #पति को पूछ ही लिया।
"खबरदार जो ऐसा किया तो.....!!  यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है??"
पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस.... वह महिला चुप हो गई।

पर जैसा वातावरण था...और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी।

खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी।

पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते।

"यह शायद मेरा दुर्भाग्य है..... अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप....कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है।"

"शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है।"

"ओह... इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है?"

"जिस नियम के पालन से #दिल कष्ट पाता रहे... उसका पालन क्यों करूँ?"

और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी।
#पतिदेव इस रोग को ताड़ गए।
उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया।
गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए।

सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।

किन्तु.......
अरे.....यह क्या..?????
.

ज्यों ही वे गांव की कांकड़(सीमा) से बाहर निकले...
पीछे भयानक विस्फोट हुआ।
पूरा गांव धू धू कर जल रहा था।

सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए।
और उस स्त्री को अपने पतिका महत्त्व समझ आ गया।
वास्तव में....इतने दिन गांव बचा रहा...
तो केवल इस कारण....उसका परिवार गांव की परिधि में था।
हे... भारत!!
यद्यपि यहाँ थूकने वाले फलफूल रहे है।
पर
तू जाने न देना....
उस साध्वी को।
वरना........
वाकई #गजब हो जाएगा।
#kss

रविवार, 26 जुलाई 2015

मिडिया अजगर

स्तरहीन, घटिया मानसिकता वाले गिरे हुए लोगों को देखना है है तो भारतीय मिडिया में बैठे लोगों से बढ़कर आपको कोई न मिलेगा।
न जाने, अपने को किस लोक का प्राणी मान ये लोग जी रहे है?
जी क्या रहे है...लगभग रेंग रहे है। अपने ही माँस को उधेड़ कर बेच रहे है। अपनीबुद्धि के दिवालिये  का डिंडिम घोष कर रहे है।
लगभग एक हजार शब्दों की डिक्शनरी को ही बार बार पारायण कर तज्ञ विज्ञ होने की नोटँकी कर रहे है।
जैसे किसी बदनाम बस्ती की औरतेँ दिन को मिलने के समय शराफत का आवरण पहन कुछ भारी शब्दों की परस्पर जुगाली करती है ताकि रात्रि जनित पापकर्म की कुंठा कुन्द हो सके, वैसे ही ये भारतीय जनता के एक बड़े वर्ग की नजर में स्वयम् को जैसे तैसे निर्दोष होने की स्थापना की स्थापना में है।
जैसे किसी कुटिल मदारी के सामने पालतू बन्दरिया, कुछ रूटीन के करतब निपटाती है वैसे ही ये अपने चैनल मालिकों के हन्टर से त्रस्त, दिन भर कुछ न कुछ निरर्थक में व्यस्त रहते है।
जैसे कोई नोसिखिये गायक, कहीं से भी दाद न मिलने पर परस्पर अहो रूपम् अहो ध्वनि का मुशायरा सजाते है वैसे ही ये लोग एक दूसरे की बासी उल्टी को परम् ज्ञानामृतं मान अवलेह करते रहते है।
जैसे कुछ टपोरी नित्य पिटने के बाद भी आपस में डींगें हाँकते है वैसे ही ये हर समय सशंकित हो भीत हिरणी बने अपनी ही बड़ाई में व्यस्त रहते है।
जैसे कुछ अंधे, किसी नव पाखण्डी के धूर्त प्रलाप को ब्रह्मज्ञान समझ, निरन्तर उससे बलात्कार को आतुर रहते है वैसे ही ये राष्ट्रद्रोह को ही राजनीति मान उनके गुणगान में रत रहते है।
जैसे तड़पते जीव की अंतिम श्वांस के प्रेक्षक गिद्ध की दृष्टि चमक जाती है, वैसे ही किसी भी दुर्घटना पर इनके कैमरे एक्स रे में बदल जाते है।
प्रस्तुत है इसका अंतिम समाधान
जैसे कोई विशाल अजगर, नाना जीवों के भक्षण से अपने ही स्थूल आकार से श्लथ हो, वार्धक्य जनित मांसपेशी बल से वियुक्त, तंद्रिल हो मृत्यु की प्रतीक्षा में रहता है और किसी दिन पेट में मौजूद आंतरिक परजीवियों के सबलन से रुग्ण होने पर जंगली चींटियों के अचानक आक्रमण से एक एक अंग के छिलते जाने से क्रमशः मृत्यु का इंतजार करता है और अत्यंत दैन्यवस्था को प्राप्त हो शनेः शनेः इस संसार को उसी सन्सरण अवस्था में छोड़ प्रयाण कर जाता है वैसे ही शोशल मीडिया के उदीयमान होने पर घर के तपड़ बेच, समापन की ओर बढ़ रहा है।
#kss

सोमवार, 20 जुलाई 2015

लवस्टोरी

एक नामी होटल का रूम बॉय, ट्रैन से अपने घर को जा रहा था। कुछ तेज तो था ही, अभिजात्य वर्ग की निकटता से कई टोटके भी सीख गया था। लम्बा और उबाऊ सफर कैसे कटे इसका उपक्रम कर रहा था।
उसी कम्पार्ट में एक कॉलेज की महिला प्रोफेसर भी सफर कर रही थी।किसी दूरस्थ एकाकी कोने में नियुक्त होने से हर समय दूसरों से तुलना करने वाली और अपनी प्रतिभा का उपयोग न होने से असन्तुष्ट।
लड़के ने अपनी अभिजात्य व्यवहार की समस्त प्रतिभा का उपयोग करते हुए आखिर मेम को बातचीत के लिए मना ही लिया।और बातचीत की गाड़ी ज्यों ही सेकण्ड गियर में आई, खुद का परिचय एक बड़े लेखक के रूप में दिया।
बस फिर क्या था....गाड़ी सीधे टॉप गियर में आ गई। अविश्वास का कोई कारण नहीँ था क्यों कि छोरा कई सनकी लेखकों की बड़ी सूक्ष्म परिचर्या कर चुका था और एक्टिंग में नम्बर वन था।
दो घण्टे मजे में बीत गए और जब कुछ जलपान की स्थिति बनी तो दोनों ही हिचक गए।  थोड़ी सी बहानेबाजी कर इधर उधर हो लिए।
खा पीकर वापस बैठे तब दोनों ही कुछ उधेड़बुन में व्यस्त थे।पहले लड़के वाली कल्पना सुनिए
बात जान पहचान, प्यार, शादी और बच्चों की संख्या तक पहुंच गईं थी पर जब नींव की कमजोरी का भान हुआ तो वह ठिठक गया। कल्पना के घोड़े को लगाम दे, बीच में उस सीन को फिट करने की कोशिश में लग गया जब मेम को "सब कुछ सच" बताकर भला मानुस बनेगा और पछतावे के आंसू बहायेगा।
अभी...? अरे नहीँ! अभी तो काफी टाइम पास करना है। एक सप्ताह बाद?  या फिर एक माह या फिर जब तक जैसे चले वैसे ही...?
ओह....अब मै क्या करूँ? मुझे शुरू में ही सच बोलना था।.....वगैरह2
उधर मेम की कल्पना बड़ी सपाट थी।
एक किताब लिखना।छपवाना। विमोचन। भूमिका में ही लेखक महोदय का आभार जताएगी। साथी प्रोफेसरों में मान बढ़ेगा। लड़कियों को भी पता चलेगा मै क्या हूँ....!  और एक तुम लोग हो कि कुछ सीखना ही नहीँ चाहती....! ढीठ कहीँ की...सबकी सब...अरे यही तो उम्र है टेलेंट पहचानो...देखो कि तुम्हें किसका सानिध्य मिल रहा है?
पहचान बढ़ेगी तो काम भी आएगा।
मै तो फ़िल्म स्टोरी लिखूँगी।
लिखूंगी....क्या..जो लिखी हुई पड़ी है वो सब बिक जाएगी। वो...#चिंचणी वाली स्टोरी...! क्या गजब कथानक है? जो भी निर्माता लेगा मालामाल होगा। जयप्रकाश की समीक्षा छपेगी.... प्रोड्यूसर पूछेगा "मेम! धारवी का रोल किसको दूँ...?"
धारवी का रोल जो भी करेगी...सुपर डुपर स्टार होगी। हो सकता है सम्वाद भी मै ही लिखूँ.....! डबल ट्रिपल कमाई। पति पूछेगा.....अरे....तो इनके पति देव भी है।
बेचारा लेखक?
गाड़ी अब उस गुफा में प्रवेश कर गई है जहाँ आगे the end आ गया है और मुड़ने की जगह नहीँ।
रिवर्स गियर....लगाओ।
लव स्टोरी समाप्त।
यात्रा भी समाप्त।
#kss

रविवार, 5 जुलाई 2015

वृद्ध

"जब तक यह दिव्य पुरुष जिन्दा है....अश्वत्थ वृक्ष हरा रहेगा। झरना बहता रहेगा। वर्षा होती रहेगी.......!"
इस आकाशवाणी को सुनकर  श्री "र" नाम के व्यक्ति ने सोचा.....ओह! यद्यपि समय कम है और दिव्य पुरुष मृत प्राय है, तथापि इसे बचाने के प्रयत्न करने चाहिए।
श्री "र" लग गए।अपनी समस्त शक्ति के साथ। रात-दिन एक करके, भूख प्यास पर विजय पाकर, सुख निद्रा को तिलांजलि दे, परिवार की अवहेलना कर, शीत-ग्रीष्म की गणना से विरक्त, समस्त सुविधाओं से परांमुख हो, दूसरों के उपहास सहन कर, सज्जनों की निष्क्रियता से आहत हुए बिना, विरोधियों के व्यंग्य प्रहार से विचलित न होते हुए......सचमुच....ब्रह्मा के सृष्टि निर्माण पश्चात् यह अद्भुत परिश्रम का अनुष्ठान...प्रथम बार हो रहा था।
और चार पांच गिद्ध, उनमने से अश्वत्थ की डाली पर बैठे दिव्य पुरुष की अंतड़ियोँ का इंतजार कर रहे थे।
झरने की पहाड़ी के शिखर पर कुछ भेड़ियों की आँखों में चमक थी।
बिलों में बैठे नाग अपने विषदंत तीखे कर रहे थे।
यहाँ तक कि मृत भक्षी रेंगने वाले कीडों को भी दिव्य पुरुष से "आशा" थी।
और तो और......
श्री "र" की परिचर्या से कुछ कुछ स्पंदित होते और चेतन होते, दिव्य पुरुष के अंग भी इस गुमान में थे कि यह चेतना मेरी कोशिश का परिणाम है।
हाथ का दावा था कि समस्त उत्थान का भूत भविष्य मेरा है तो सिर कुछ और ही सेटिंग में व्यस्त था।
पेट ने खराब होने का ढोँग रच रखा था तो पैर अपने को जननेन्द्रिय वाली जगह फिट करने की जुगत में लगे थे।
बड़ी अजीब सी स्थिति।
कमजोर परिवार की कलह के समान सारे अंग, एक दूसरे को ही ऊँचा नीचा बताने की जुगत में थे।
यह देखकर  "गिद्ध से कीड़ों" पर्यन्त समस्त वर्ग को ख़ुशी हुई।
श्री "र" फिर भी लगे है। अचेतावस्था के बहाने कभी हाथ का झापड़, तो कभी पैर की लात भी लगती। नाक से झरता कफ श्लेष्मा भी साफ करना पड़ता तो हर घण्टे डायपर बदलना पड़ता।
कभी मालिश हो रही है तो कभी केश संवारे जा रहे है।
और....श्री "र" की हालत.....? निद्रा, अपमान,थकान, पीड़ा, घात,आघात, सहित इस घोर कर्म से जब थकते तो एक क्षण को ऊपर की ओर ताकते.....!
डाल पर बैठा गिद्ध संकेत करता...."क्यों फालतू मथाफोड़ी कर रहे हो? आखिर तो मुझे ही देना पड़ेगा।"
#kss (6-7-15)

सोमवार, 8 जून 2015

राजपूत

1977-78 के वर्ष भयंकर अकाल पड़ा...मरुभूमि में।
चनण सिंह के कुल 250 गायें थीं।
आवतु सुथार की 40, कुम्हार की 10, नाई की 20, महाराज(पालीवाल जी) की 150 गायें, सोढा परिवार की 500 और चैन सिंह की 100थी।
कार्तिक आते आते घास खत्म....कुत्ते कुकाट करते और रिवड़ी की तीनों तलैयाँ सूख चुकी थी।
माताजी के सारे गहने...सोना चाँदी आदि बिक चुके थे।और....तय हुआ कि गायों को यहाँ से 300किमी दूर हाकड़ा तले(कुए) पर ले जायेंगे।
हाकड़ा तलासूना था....1965 के युद्ध में उसके मालिक उनड़ मुसलमान सिंध भाग चुके थे।सूखी सेवण घास बहुत थी और पानी कुछ कुछ खारा था।
दो गधे...तीन ऊंट....और 5 पुरुष....पांच पुरुषों में भी चैनसिंह तो 15वर्ष का लड़का ही था...एक हजार से ज्यादा गायें लेकर हकड़ा पहुँचे। एकदम पाक बोर्डर पर।
रायधरों का गवाड़ पहले ही वहाँ पहुंच चुका था। हजारेक गायें उनकी थी।
सूना कुंआ आबाद हो गया....!एक दिन छोड़ के एक दिन के अंतराल से अपने गवाड़ का नम्बर आता।ऊँटों से पानी निकाला जाता।60पुरुष(160फीट)गहरे कुंए से 2बजते बजते सारी गायें पानी पी चुकी होती।
बाद में रोटियां बनती....खेजड़ी के नीचे... बड़ी कठोर दिनचर्या थी...!कुछ कुछ गायों ने ब्याना शुरू किया...दूध में रोटी और बछडों के लिए पखाल में पानी....चैत्र के बाद गर्मी बढ़ी...पानी के चड़स ज्यादा निकालने होते...ज्यादा दबाव सहन नहीँ कर सकने से एक ऊंट मर गया।
तुरन्त सबके कानों के गोखरू(एक गहना) इकट्ठे कर साढ़े सात तोले सोने के बदले....रामगढ़ से दूसरा ऊंट खरीदा गया।
#kss
आषाढ़ आते आते बादल आने लगे।कहीँ कहीँ बरसात होने के समाचार आने लगे।.....लगभग आधी गायें मर चुकी थी।
कमोबेश सारे #खडाल की यही स्थिति थी। रामगढ़ के वैश्य वर्ग ने कई मण सोना चाँदी जुटा लिया था...और अब मद्रास जाने की तैयारी में थे।(बाद में वे वहाँ गए और बड़े मारवाड़ी सेठ बन गए।)
आधे आषाढ़ की किसी अँधेरी रात में चमकती बिजली से अंदाजा किया गया कि यह बरसात रिवड़ी पर हो रही है। तैयारियां की गई....गायों के कान में कहा गया "हल भटारि अपणे देश....!"
गायें सुबह होते होते तैयार थी....पूरे गवाड़में घर जाने का उत्साह...दिन भर चलते रहे।
शाम को सतारवाली पर डेरा दिया।गायों ने पालर पाणी पिया।गधों से भार उतारा।
रोटी बनाने का समय नहीँ था।
तपेली में दूध गर्म कर पी रहे थे।
अमावस की उमस भरी रात थी। अँधेरा.....उमस....भयंकर गर्मी...बिजलियों की चमक के बीच....चनण सिंह के पेट में दर्द उठा और क्षण भर में तड़पते हुए प्राण त्याग कर गए।
कई दिन से पीलिया बुखार था...उमस और गर्म दूध ने जहर का काम किया....सब कुछ खत्म।
चैन सिंह की रुलाई सुन कर गायें डहाकने लगी।रात भर कोहराम मचा रहा। सबसे ज्यादा सदमे में गायें और ऊँट थे।खाना पीना छोड़ दिया।सब कुछ अस्तव्यस्त हो गया।एक एक कर सारे पशु धड़ा धड़ प्राण देते जा रहे थे....मानो प्रिय स्वामी के पथ का अनुसरण करना इनके लिए भी जरूरी हो!!
इधर ......आँगन में लाश आई और उसी समय चनण सिंह की पत्नी को प्रसव हुआ।.....ऊंट....गायें...कुछ न बचा।
और उधर......दिल्ली यूनिवर्सिटी के वामपंथी अपने सेमिनारों में जी भर कर सामन्तों को गालियां दे रहे थे।
एक इंच भी जमीन न होते हुए भी...चनण सिंह सामन्त था।उसको उखाड़ फैंकने की अपीलें हो रही थी। आग उगलती किताबें छप रही थी।पाठ्यक्रम में जनवादी लेखन के बहाने., चनण सिंह को जड़ मूल से उखाड़ने की प्रतिज्ञा करते वृतांत परोसे जा रहे थे।
प्रगतिशील कवियों की मानें तो चनण का अभी अभी जन्मा शिशु.#.   #एक_सपोला है जो क्रांति की चिंगारी लाने में सहायक है।
सुथार, नाई और महाराज ने अपनी अपनी बची गायें सम्भाली।
सामने बुनकरों के मुहल्ले में सर्वोदयी सत्संग चलता और इधर एक #सामन्त अपनी माँ के सूखे हृदय में दूध खोजता बिलबिलाता।
#kss

बुधवार, 20 मई 2015

भावुकता और पाखण्ड

भारतीय समाज एकांगी भावुकता में जीता है।
एकांगी भावुकता पाखण्ड को जन्म देती है।जीवन का अतिशय दोहरापन-तिहरापन ढोने की मजबूरी में पिसता भारतीय समाज जिन्दा भी है, यह दोहरापन, यदि ऐसा पाखण्डी दबाव किसी और समाज पर होता तो वह कब का समाप्त हो जाता।
इसका कारण है...भारतीय जन संयुक्त परिवार में रहता आया है और एक ही व्यक्ति कई सम्बन्धों का निर्वाह करता है।उसे दुहराव तिहराव का अभ्यास जन्म से ही प्राप्त होता है।वह पुत्र और पिता, पति और अपना व्यवसाय का दायित्व बड़े मजे से कर लेता है।
इन अनेक दायित्वों के परिणाम स्वरूप वह मस्तिष्क में कई समानांतर धाराओं पर एक साथ सोचने की क्षमता रखता है।
यह कदाचित् वरदान भी है और बदली विश्व व्यवस्था में अभिशाप भी।
वह सबको हाँ करके अपने मन की कर सकता है।अनेक लोगों को यह अहसास दिला सकता है कि मै आपके साथ हूँ और एन वक्त पाला बदल सकता है। दिन में नारी सम्मान पर भाषण देकर रात्रि में उत्पीड़न की योजना बना सकता है।
बिना हिचक, वह अपनी अंतरात्मा से समझोता कर सकता है।
रात दिन धर्म निरपेक्षता का जाप करता हुआ और सेकुलरों को आश्वस्त करता हुआ भी, पता नहीँ कब उनको लात मार दे...कह नहीँ सकते।
यह निर्मल बाबा को भी पूज सकता है और कभी जँच गई तो पल में पलट सकता है।
उधर, मुस्लिम जगत कुरान के इर्द गिर्द ही रहना चाहता है तो ईसाई समाज अपने सामाजिक अनुशासन से भागने की सोच भी नहीँ सकता।
भयंकर विभेद और कृत्रिम भुखमरी में भी, विचलित न होने वाला भारतीय समाज अब पर्याप्त चेतन हो गया है तो कम से कम वामपंथी और मिशनरीज का चारा तो कदापि नहीँ बनेगा।
अपितु कहीँ कहीँ इसने उन आसुरी विचारधाराओं से पर्याप्त वंचना कर उलटे उन्हीं का शोषण कर चूसने के बाद गुठली की तरह फेंक भी दिया।
सबल हिन्दुत्व के नए दौर में देखना....!
झुण्ड के झुण्ड घर वापसी करेंगे। लुटा पिटा वामपंथ और लँगोटी मात्र शेष इस्लाम भागता नजर आएगा।
अपने पितृ देशों से अकूत धन उमेठकर लाती मिशनरीज... हत भाग्य पीछे हटती नजर आ रही है। और आप देखना जगत् के समस्त त्रस्त मानव प्रबल वेग से हिंदुत्व गंगा का अवगाहन करने को दौड़ते नजर आएंगे।
"क्या होगा, क्या नहीँ होगा" का द्वन्द्व अज्ञान जनित है।बिलकुल वैसे ही जैसे स्वामी विवेकानन्द के मन में शिकांगो भाषण से पहले था।
अभी तो आप विश्वास शायद ही करें...पर और गहराई से सोचिये...आपको भारत का सबकुछ पवित्र लगेगा।यह पाखण्ड और दोहरी भावुकता भी। वर्तमान isis के समान बर्बर मुस्लिम सत्ता के 700वर्ष के कालखण्ड में भी यह समाज अपना बहुत कुछ बचा सका....उसमें भावुकता और पाखण्ड का भी योगदान है।
#kss